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Bihar-Jharkhand की सीमा पर खत्म नहीं हो रहा जमीन विवाद, दबंगों का साै बीघा भूमि पर कब्जा; विरोध के कारण बैरंग लौटी सीमांकन टीम

LHC0088 2025-12-10 23:07:45 views 1248
  

बिहार के भागलपुर और झारखंड के साहिबगंज की सीमा पर जमीन विवाद। (सांकेतिक फोटो)  



जागरण संवाददाता, साहिबगंज। Jharkhand-Border Land Rowःःःझारखंड के साहिबगंज और बिहार के भागलपुर जिले के तीन माैजा की जमीन को लेकर विवाम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। तीनों माैजा की जमीन का विवाद ऐसा लग रहा है जैसे भारत-पाक के बीच सीमा विवाद हो। बुधवार को सीमांकन करने पहुंची टीम बैरंग लौट गई। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

ग्रामीणों व कर्मचारियों के बीच सहमति नहीं बनने से दूसरे दिन भी मापी नहीं हो सकी। भागलपुर और साहिबगंज-दोनों जिला के अंचल कर्मचारी हाईकोर्ट के आदेश पर 2018 में हुई मापी के दौरान गाड़े गए सीमेंट के पिलर को आधार मानकर मापी करना चाहते थे लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि मापी जब भी होगी तो साहिबगंज के तेलियागढ़ी से होगी या पीरपैंती से होगी।

ग्रामीणों के अनुसार तीन मौजा के सेंटर से कड़ी गिराने पर 40-40 चैन बाबुपुर व मखमलपुर में प्रवेश करता है जो जमीन अर्सेक्षित है। ग्रामीण इस स्थल से मापी को तैयार नहीं हैं। अंचल कर्मियों का कहना था कि पूर्व में गाड़े गए पिलर से मापी करने पर बिहार के बाबुपुर व बैजनाथपुर तथा झारखंड के साहिबगंज सदर प्रखंड के मखमलपुर मौजा का मिलान हो जाता है। अब वरीय अधिकारियों से इस मामले पर चर्चा की जाएगी जिसमें बाद मापी होगी।

क्या है मामला : 1985 से बाबुपुर, बैजनाथपुर व मखमलपुल (साहिबगंज) के सीमांकन को लेकर किसानों के बीच लंबी लड़ाई चल रही है। सीमांकन नहीं होने से मखमलपुर के किसान को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। दबंग हजारों एकड़ जमीन को जबरन कब्जा किए हुए हैं।

किसान कार्यालय व व्यवहार न्यायालय का चक्कर लगाते लगाते थक गए। मो. मुस्तका नामक किसान ने 2014 में हाइकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें झारखंड के साथ-साथ बिहार सरकार को पार्टी बनाया गया। कोर्ट ने 2018 में ही दोनों जिलों के उपायुक्त को सीमांकन कराने का आदेश दिया था।

तत्कालीन डीसी संदीप सिंह के नेतृत्व में दोनों जिला के कर्मचारियों ने मापी शुरू की लेकिन विवाद बढ़ जाने की वजह से मापी स्थगित करनी पड़ी। पुन: एक बार हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है।

  

संयुक्त बिहार के तीन मौजा के सीमांकन को लेकर 1985 से लड़ाई लड़ रहा हूं। झारखंड अलग होने के बाद भी हम किसानों को इंसाफ नहीं मिला। कार्यालय का चक्कर लगाकर थक गया। हमारी सौ बीघा से अधिक जमीन दबंगों ने कब्जा कर रखा है।

हजारों किसान अपनी जमीन रहते हुए भी भुखमरी के कगार पर हैं। इंसाफ के लिए 2014 में हाइकोर्ट का शरण में गया। पहली बार आदेश पर 2018 में सीमांकन को लेकर टीम आयी लेकिन सफल नहीं हो सकी। दोबारा पुन: दोनों जिला के टीम आयी है। अभी तक बात नहीं बन सकी है। आशा करता हू कि इस बार हम किसानों को इंसाफ जरूर मिलेगा।-मो. मुस्ताक, हाईकोर्ट याचिकाकर्ता
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