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दुर्घटना ने छीनी रोजी-रोटी, हाईकोर्ट ने दिया न्याय, मुआवजा 3.32 लाख से बढ़ाकर 11.89 लाख मिलेगा

LHC0088 2025-12-13 16:37:21 views 641
  

पंजाब- हरियाणा हाईकोर्ट।  



दयानंद शर्मा, चंडीगढ़ । पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए मोटर वाहन दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए मोहाली निवासी एक व्यक्ति के पक्ष में आदेश देते हुए मुआवजा राशि को बढ़ा दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकलपीठ ने ट्रिब्यूनल द्वारा पहले तय की गए मुआवजे को बढ़ाते हुए इसे 11.89 लाख रुपये कर दिया। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि ट्रिब्यूनल ने पीड़ित की आय, उसकी स्थायी कार्यक्षमता में कमी और दुर्घटना के जीवनपर्यंत प्रभावों का सही आकलन नहीं किया था, जिसके चलते मुआवजा बेहद कम निर्धारित हो गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि न्याय का उद्देश्य पीड़ित को उसकी वास्तविक स्थिति के निकट पहुंचाना होता है, न कि औपचारिकता निभाते हुए उसे न्यूनतम राशि थमाना।

यह देखते हुए कि याची काला डेयरी व्यवसाय से जीविकोपार्जन करता था और दुर्घटना के बाद उनका पूरा व्यवसाय प्रभावित हो गया, अदालत ने मामले को बेहद संवेदनशीलता और न्यायिक सतर्कता से परखा।

न्याय के लिए 10 साल का लंबा इंतजार

दुर्घटना 24 नवंबर 2015 की है, जब गंभीर सड़क हादसे में याची को दाहिने हाथ, दाहिने पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गहरे फ्रैक्चर हुए थे। मेडिकल रिकार्ड बताता है कि उनके पैर और हाथ में धातु की राड लगानी पड़ी थी और डाक्टरों ने स्पष्ट कहा कि अब वह वाहन चलाने में सक्षम नहीं हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया कि याची गांव में डेयरी चलाता था और 25 भैंसों व 5 गायों के सहारे प्रतिदिन लगभग 150 किलो दूध बेचते थे। जिससे उसकी मासिक आय लगभग 90 हजार रुपये तक जाती थी, जिसमें से खर्च घटाने पर भी पर्याप्त कमाई बचती थी।

आर्थिक स्थिति को समझ सुनाया फैसला

ट्रिब्यूनल ने इसलिए उनकी आय को 7,000 रुपये मान लिया क्योंकि आय का कोई लिखित रिकार्ड नहीं था। हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को अव्यावहारिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं से परे बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण डेयरी व्यवसाय में लिखित रिकार्ड का अभाव सामान्य है।  

कोर्ट ने साफ किया कि मौखिक साक्ष्य को सिर्फ इसलिए नहीं ठुकराया जा सकता कि वह कागज पर दर्ज नहीं है। कोर्ट ने याची की मासिक आय 15,000 रुपये निर्धारित की, जिसे न्यायालय ने दुर्घटना और उसके प्रभावों के संदर्भ में उचित माना।

अदालत ने कहा कि पीड़ित के जीवन में आए बदलाव, उसके दर्द, भविष्य की संभावनाओं और मानसिक आघात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने विभिन्न मदों दर्द व पीड़ा, भविष्य की आय में कमी, चिकित्सा व्यय, भविष्य के उपचार, परिवहन, अटेंडेंट, विशेष आहार सब में समुचित वृद्धि की।

तकरीबन तीन गुणा अधिक मिलेगा मुआवजा

कुल मुआवजा 11,89,000 रुपये निर्धारित हुआ, जिसमें से पहले दिए गए 3,32,900 रुपये घटाने पर याची को 8,56,100 रुपये अतिरिक्त मिलेंगे। अदालत ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि यह राशि 9% ब्याज सहित दो माह के भीतर ट्रिब्यूनल में जमा कराई जाए।

अदालत ने कहा कि किसी भी पीड़ित के लिए आर्थिक राहत सिर्फ एक राशि नहीं होती बल्कि टूटी हुई जिंदगी को दोबारा संभालने का आधार होती है। इसलिए न्यायालय का दायित्व है कि वह राहत को यथार्थ, संवेदना और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप निर्धारित करे।
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