अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी
जागरण संवाददाता, राजगीर(नालंदा)। बिहार की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगरी राजगीर इन दिनों एक बिल्कुल अलग ही पहचान गढ़ रही है। यहां की पहाड़ियां, घने जंगल और शांत वादियां अब सिर्फ पर्यटकों और श्रद्धालुओं को ही नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर यूरोप, रूस, मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षियों को भी अपनी ओर खींच रही हैं। सर्दियों के आगमन के साथ ही राजगीर का आकाश रंग-बिरंगी उड़ानों और जंगलों की चहचहाहट से गूंज उठा है। इस बार प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी ने पुराने सभी रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं।
राजगीर जू सफारी, नेचर सफारी और इससे सटे वन्यप्राणी आश्रयणी क्षेत्रों में वन विभाग द्वारा कराए गए हालिया पक्षी सर्वेक्षण ने साफ कर दिया है कि राजगीर अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी मार्गों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक केंद्र बन चुका है।
दो चरणों में हुआ सर्वे, आंकड़ों ने चौंकाया
राजगीर क्षेत्र में पक्षी सर्वेक्षण दो चरणों में किया गया। पहला चरण फरवरी 2025 में आयोजित हुआ, जिसमें कुल 109 पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई। इनमें 29 प्रवासी पक्षी शामिल थे। इस चरण में मध्य एशिया से आने वाली कई दुर्लभ वॉर्बलर प्रजातियों का अवलोकन हुआ, जिनमें सल्फर-बेलिड वॉर्बलर, येलो-ब्राउड वॉर्बलर और टिकेल्स लीफ वॉर्बलर प्रमुख रहीं।
इसके साथ ही इंडियन वल्चर और ग्रिफॉन वल्चर जैसे संकटग्रस्त गिद्धों की उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि राजगीर की पहाड़ियां न केवल सामान्य पक्षियों, बल्कि विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों के लिए भी सुरक्षित आश्रय स्थल बन रही हैं।
दूसरा चरण दिसंबर 2025 में कराया गया, जिसमें पक्षियों की विविधता और भी अधिक सामने आई। इस चरण में कुल 135 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें 33 प्रवासी पक्षी शामिल थे। इस सर्वे की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘यूरेशियन स्पैरोहॉक’ का दर्ज होना रहा, जिसे नालंदा जिले में पहली बार रिकॉर्ड किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह खोज इस बात का ठोस प्रमाण है कि राजगीर यूरोप और मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप तक फैले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी मार्ग का अहम हिस्सा बन चुका है।
शिकारी पक्षियों की मौजूदगी ने बढ़ाई अहमियत
सर्वेक्षण में केवल छोटे और रंगीन पक्षी ही नहीं, बल्कि शक्तिशाली शिकारी पक्षियों की भी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई। हिमालयन बजर्ड, बोनेलीज़ ईगल, ब्लैक-विंग्ड काइट, क्रेस्टेड हॉक ईगल, क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, लॉन्ग-लेग्ड बजर्ड और यूरेशियन केस्टरेल जैसे शिकारी पक्षियों का दिखना यह दर्शाता है कि राजगीर का पारिस्थितिक तंत्र संतुलित और स्वस्थ है।
इसके अलावा स्केली थ्रश, ऑरेंज-हेडेड थ्रश, टिकेल्स थ्रश, इंडियन पिट्टा, लार्ज हॉक-कुक्कू और साइबेरियन स्टोनचैट जैसी महत्वपूर्ण शीतकालीन प्रवासी प्रजातियों की मौजूदगी ने इस क्षेत्र की जैव विविधता को और समृद्ध साबित किया है।
वॉर्बलर प्रजातियों की भरमार बनी पहचान
इस सर्वेक्षण की सबसे खास बात रही वॉर्बलर प्रजातियों की असाधारण विविधता। धान के खेतों, दलदली आर्द्रभूमियों, सरकंडों वाले इलाकों, झाड़ियों और जंगलों की कगारों पर कुल 11 वॉर्बलर प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें बूटेड वॉर्बलर, पैडीफील्ड वॉर्बलर, ब्लाइथ्स रीड वॉर्बलर, सल्फर-बेलिड वॉर्बलर, डस्की वॉर्बलर, येलो-ब्राउड वॉर्बलर, टिकेल्स लीफ वॉर्बलर, कॉमन चिफचाफ, ग्रीनिश वॉर्बलर, ह्यूम्स वॉर्बलर और क्लैमरस रीड वॉर्बलर शामिल हैं।
पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में वॉर्बलर प्रजातियों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि यहां कीटों की भरपूर उपलब्धता है, रासायनिक प्रदूषण अपेक्षाकृत कम है और विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक आवास सुरक्षित हैं।
साइबेरिया और टुण्ड्रा से भी आए पंखों वाले सैलानी
सर्वेक्षण में पिन-टेल्ड स्नाइप की मौजूदगी ने विशेष ध्यान खींचा। यह पक्षी उत्तरी रूस और साइबेरिया की आर्द्रभूमियों व टुण्ड्रा क्षेत्रों में प्रजनन करता है और सर्दियों में भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर प्रवास करता है। इसके अलावा टिकेल्स ब्लू फ्लायकैचर, इंडियन पैराडाइज फ्लायकैचर, ब्लू-थ्रोटेड ब्लू फ्लायकैचर, टैगा फ्लायकैचर और रेड-ब्रेस्टेड फ्लायकैचर जैसे प्रवासी पक्षी भी देखे गए, जो निरंतर और स्वस्थ वन आवासों पर निर्भर रहते हैं।
धान के खेत बने अंतरराष्ट्रीय मेहमानों का ठिकाना
इस सर्वे में पैडीफील्ड वॉर्बलर की उपस्थिति खास रही। यह प्रवासी पक्षी धान के खेतों और दलदली घासभूमियों से गहराई से जुड़ा होता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक कृषि पद्धतियां भी प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि का काम कर रही हैं। यह खोज बदलते प्रवासी पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी मददगार साबित होगी।
वन विभाग की भूमिका और भविष्य की दिशा
राजगीर जू सफारी के निदेशक राम सुन्दर एम ने बताया कि यह सर्वेक्षण राजगीर वन्यजीव अभयारण्य की पारिस्थितिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि सफारी गाइडों को प्रवासी पक्षियों की पहचान और उनके व्यवहार की जानकारी देने का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि पर्यटकों को इस समृद्ध जैव विविधता से रूबरू कराया जा सके।
वन विभाग द्वारा लगातार किए जा रहे मृदा संरक्षण, नमी संरक्षण और जलाशयों के पुनर्जीवन कार्यों से इलाके में जल स्तर बेहतर हुआ है। इसका सीधा लाभ प्रवासी पक्षियों को मिल रहा है, जिन्हें यहां सुरक्षित भोजन, पानी और विश्राम स्थल उपलब्ध हो रहे हैं।
राजगीर: अब सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, पारिस्थितिक धरोहर भी
राजगीर कभी बुद्ध, महावीर और राजाओं की तपोभूमि के रूप में जाना जाता था। अब यह अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित पड़ाव बनकर एक नई पहचान हासिल कर रहा है। बिना पासपोर्ट और वीज़ा के हर साल यहां पहुंचने वाले ये पंखों वाले मेहमान इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सही तरीके से किया जाए, तो बिहार भी वैश्विक जैव विविधता मानचित्र पर एक मजबूत स्थान बना सकता है। |
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