तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव। फाइल फोटो
राज्य ब्यूरो, पटना। RJD Committee: लगभग सात माह पहले मंगनीलाल मंडल राजद में प्रदेश अध्यक्ष चुने गए थे। तब माह भीतर प्रदेश कमेटी गठित कर लिए जाने का दावा हुआ था, जिसका गठन अभी तक नहीं हुआ।
कारण, सभी को संतुष्ट रखने की आवश्यकता-विवशता है, जो पसंद-नासपंद के आड़े आ रही। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राजद के लिए यह विवशता और अधिक बढ़ गई है।
हालांकि, संभावना जताई जा रही कि सूर्य के उत्तरायण होने के साथ प्रदेश कमेटी भी अपने स्वरूप में आ जाएगी। विदेश भ्रमण कर तेजस्वी यादव भी स्वदेश लौट आए हैं और लालू प्रसाद भी मकर संक्रांति तक पटना लौट सकते हैं।
क्या दबाव का असर दिखेगा कमेटी पर?
सब कुछ यथावत रहा, तो दोनों के सुझाए नामों को जोड़ने-घटाने के बाद मंडल अपनी कमेटी सार्वजनिक करेंगे। सभी को संतुष्ट करने की विवशता में राजद की प्रदेश कमेटी प्राय: जंबो हो जाती है, जहां सौ-सवा सौ के लगभग सचिव और महासचिव बना दिए जाते हैं।
यह दबाव इस बार इसलिए भी अधिक है, क्योंकि पराजय के बाद सभी को एकजुट रखने की चुनौती है। तेजप्रताप यादव और रोहिणी आचार्य के प्रकरण के बाद अब परिवार से बेशक कोई आवाज नहीं उठे, लेकिन पराजय के कारणों के लिए चिह्नित भितरघाती कार्रवाई के बाद शिथिल नहीं बैठेंगे।
उनमें कुछ बड़े चेहरे भी हैं। उनके द्वारा विघ्न-विद्रोह की आशंका स्वाभाविक है। ऐसे में राजद के पास दो ही विकल्प हैं, या तो वह कार्रवाई का विचार छोड़ दे, या फिर उन भितरघातियों के निकटस्थ प्रभावी चेहरों को संगठन में पद देकर संतुष्ट रखे। यह एक तरह से सौदेबाजी की स्थिति होगी और ऐसे में प्रदेश कमेटी का आकार अपेक्षा से बड़ा हो जाएगा।
राजद के एक पदाधिकारी का कहना है कि सांगठनिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में बड़ी कमेटी कभी कारगर नहीं होती। राजद को इसका पर्याप्त अनुभव है।
पद के साथ महत्व की लिप्सा स्थायी रूप से बढ़ जाती है, जबकि धरातल पर असली काम कार्यकर्ता करते हैं। ऐसे में हितों के टकराव की आशंका प्रबल होती है।
वैसे बड़ी कमेटी के बावजूद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह अपने अनुशासन के दम पर पार्टी पदाधिकारियों को नियंत्रित रखने में काफी हद तक सफल रहे।
अति-पिछड़ा कार्ड को कारगर नहीं मानकर अवसर की ताक में
हालांकि, उन्हें भी कम विरोध नहीं झेलना पड़ा। इस उपक्रम में उनके रूठने-मनाने के कई दौर के साक्षी स्वयं लालू हैं। मंडल से जगदानंद जैसी कड़क व्यवस्था की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
इस बहाने विघ्न संतोषी लोग उत्साहित हैं। अपने लिए अवसर की ताक में वे शीर्ष स्तर पर परिवर्तन की पैरोकारी करने लगे हैं। तर्क यह कि चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि अति-पिछड़ा कार्ड प्रभावी नहीं रहा।
वस्तुत: यह समीकरण की सीमा है। सूत्रों का कहना है कि लाख प्रयास के बावजूद जो वर्ग राजद के प्रति राजद के प्रति आकर्षित नहीं हो रहा, वह किसी एकतरफा निर्णय से क्या और दूर नहीं हो जाएगा!- |
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