सांकेतिक तस्वीर।
विजय जोशी, जागरण देहरादून: उत्तराखंड इस समय असामान्य रूप से शुष्क शीतकाल के दौर से गुजर रहा है। अक्टूबर में सामान्य से अधिक वर्षा के बाद मानो मौसम रूठ गया हो।
नवंबर और दिसंबर में प्रदेश में लगभग न के बराबर वर्षा और बर्फबारी हुई, जबकि जनवरी में भी फिलहाल मौसम शुष्क बना हुआ है। नए साल की शुरुआत में ऊंची चोटियों पर हल्के से मध्यम हिमपात ने कुछ उम्मीदें जरूर जगाईं, लेकिन यह नाकाफी मानी जा रही हैं। वहीं, मौसम विभाग ने अगले तीन माह भी वर्षा सामान्य से कम रहने के संकेत दिए हैं।
दिसंबर में वर्षा में रिकार्ड 100 प्रतिशत की कमी दर्ज होने के बाद भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) ने उत्तराखंड समेत पूरे पश्चिमी हिमालय के लिए चिंता बढ़ाने वाला पूर्वानुमान जारी किया है। आइएमडी के अनुसार जनवरी से मार्च के बीच उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा सामान्य से कम रहने के आसार हैं।
आइएमडी का कहना है कि इस अवधि में उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश हिस्सों में मौसमी वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के 86 प्रतिशत से भी कम रह सकती है। यह अनुमान पश्चिमी हिमालय के लिए विशेष रूप से गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि यहां की शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी स्नोपैक के निर्माण, ग्लेशियरों के संरक्षण, नदियों के जलस्तर, कृषि और जलविद्युत उत्पादन के लिए बेहद जरूरी होती है।
देहरादून स्थित क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों ने बताया कि जनवरी से मार्च तक का मौसमी पूर्वानुमान उत्तराखंड में लगातार वर्षा की कमी की ओर संकेत करता है, जो दिसंबर में पड़े असामान्य सूखे के बाद सामने आया है।
विशेषज्ञों के अनुसार बीते महीनों में शुष्क मौसम का प्रमुख कारण पश्चिमी विक्षोभों की लंबे समय तक अनुपस्थिति रही, जो सामान्य तौर पर सर्दियों में उत्तर भारत में बारिश और हिमपात लेकर आते हैं।
ग्लेशियर-नदियों पर दिखेगा असर
मौसम विज्ञानियों का मानना है कि यह स्थिति केवल एक बार की मौसमी गड़बड़ी नहीं, बल्कि पश्चिमी हिमालय में शीतकालीन वर्षा के पैटर्न में बहुवर्षीय बदलाव का संकेत भी हो सकती है। इसका असर आने वाले महीनों में गर्मी के सामान्य से अधिक रहने, ग्लेशियरों पर कम बर्फ जमने और नदियों के जलस्तर में गिरावट के रूप में दिखाई दे सकता है।
काश्तकारों की भी बढ़ी चिंता
सूखे शीतकाल का असर खेती और बागवानी पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कम वर्षा से रबी की फसल प्रभावित हो सकती है, जबकि कम बर्फबारी के कारण पर्याप्त ‘चिलिंग आवर्स’ न मिलने से सेब उत्पादन और गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जिससे उत्तराखंड के काश्तकारों के चेहरों पर चिंता की लकीरें नजर आने लगी हैं।
शीतकाल में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बरसे मेघ
दिसंबर की शुरुआत से ही प्रदेश में मौसम की बेरुखी रही और पूरे माह वर्षा लगभग न के बराकर हुई। खासकर मैदानी क्षेत्रों में शुष्क मौसम के चलते पारा सामान्य से अधिक बना रहा। प्रदेशभर में मानसून सीजन के अंत से ही वर्षा बेहद कम दर्ज की जा रही है। अक्टूबर में शीतकाल की शुरुआत के बाद से लगातार वर्षा में कमी दर्ज की जा रही है। नवंबर और दिसंबर पूरी तरह सूखे बीते हैं। अब तक शीतकाल में सामान्य से 24 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।
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