फाइल फोटो।
जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB) में सीसीटीएनएस (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स) के वार्षिक रखरखाव से जुड़े टेंडर में अनियमितता का खुुलासा हुआ है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार नियमों की अनदेखी कर एक अयोग्य कंपनी को एल-1 घोषित किया गया। इससे राज्य सरकार को लगभग छह करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।
सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि आवश्यक तकनीकी और वित्तीय मानकों को पूरा न करने के बावजूद केपीएमजी एडवाइजरी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को सबसे कम दर (एल-1) वाली संस्था घोषित कर दिया गया। गलत मूल्यांकन और अनुचित अंक देने के कारण राज्य को करीब 5 करोड़ 94 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ी। चौंकाने वाली बात यह है कि इतना बड़ा मामला सामने आने के बाद भी अब तक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। जानकारी के अनुसार, इससे पहले सीसीटीएनएस के रखरखाव की जिम्मेदारी एनआईआईटी के पास थी। जुलाई 2022 में अनुबंध की अवधि समाप्त होने के बाद एससीआरबी ने नई एजेंसी के चयन के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए प्रस्ताव आमंत्रण (आरएफपी) जारी किया गया और मूल्यांकन के लिए क्वालिटी कम कॉस्ट बेस्ड सिलेक्शन (क्यूसीबीएस) पद्धति अपनाने का निर्णय लिया गया।
आरएफपी में तकनीकी मूल्यांकन के लिए स्पष्ट मानदंड तय किए गए थे। प्रबंधन और प्रक्रिया के लिए 25 अंक, बोलीदाता के अनुभव के लिए 35 अंक और डेटा सेंटर एवं एप्लीकेशन सपोर्ट के लिए 40 अंक निर्धारित थे। साथ ही यह शर्त भी रखी गई थी कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में बोलीदाता का आईटी या आईटी-संबद्ध क्षेत्र में कम से कम 150 करोड़ रुपये का टर्नओवर होना चाहिए।
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, इन नियमों के बावजूद केपीएमजी को उन श्रेणियों में भी अंक दे दिए गए, जहां वह योग्य नहीं थी। केपीएमजी का आईटी क्षेत्र में टर्नओवर 153.33 करोड़ रुपये बताया गया, फिर भी मूल्यांकन में नियमों को तोड़-मरोड़ कर उसे अतिरिक्त लाभ दिया गया। इसी वजह से उसे एल-1 घोषित कर दिया गया। इस टेंडर प्रक्रिया में केपीएमजी के अलावा कोफोर्ज लिमिटेड और सीएमएस आईटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने भी भाग लिया था।
सीएमएस ने सीसीटीएनएस रखरखाव के लिए 13.37 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी, जबकि केपीएमजी को 19.31 करोड़ रुपये का कार्यादेश सौंप दिया गया। सीएजी का स्पष्ट कहना है कि यदि निष्पक्ष मूल्यांकन होता और सीएमएस को एल-1 चुना जाता, तो राज्य सरकार को करीब 5.94 करोड़ रुपये की बचत हो सकती थी।
सीएजी की इस रिपोर्ट के बाद भी अब तक किसी प्रकार की विभागीय या कानूनी कार्रवाई नहीं होना पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की लापरवाही न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है। |
|