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आदिवासी परंपरा : हाट-बाजारों में चढ़ा मकर का परवान, पीठा के लिए कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार

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मकर संक्राति को लेकर मुसाबनी हाट में मिट्टी के बर्तनों की खूब खरीदारी हो रही है।


जागरण टीम, मुसाबनी/बहरागोड़ा। झारखंड की लोक संस्कृति के सबसे बड़े पर्व मकर संक्रांति और टुसू की खुमारी कोल्हान के जनजीवन पर सिर चढ़कर बोल रही है। चाकुलिया, मुसाबनी और बहरागोड़ा के बाजारों में परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।    कहीं नए कपड़ों की चमक है, तो कहीं मिट्टी की सोंधी महक और बांस की कारीगरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही है। मकर की तैयारी में ग्रामीण जुुट गए हैं।   
मुसाबनी: परंपराओं की खरीदारी और बाजारों में गहमागहमी

मकर संक्रांति (14 जनवरी) से पहले मुसाबनी के मुख्य बाजार और ग्रामीण हाटों में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल है। पर्व को लेकर स्थानीय लोगों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है।

बांस और मिट्टी के बर्तनों की बढ़ी मांग: ग्रामीण क्षेत्रों में मकर के अवसर पर \“गुड़ पीठा\“ और \“मांस पीठा\“ बनाने की प्राचीन परंपरा है। इसे रखने के लिए नए बांस के सूप, डाला (टोकरी) और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग शुभ माना जाता है। इसी कारण कुम्हारों और बांस कारीगरों के पास ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

कपड़ा बाजार में रौनक: कपड़ों की अस्थायी दुकानों पर भी तिल रखने की जगह नहीं है। जूते-चप्पल और श्रृंगार प्रसाधनों की दुकानों पर दिनभर ग्रामीण महिलाओं और युवाओं की भीड़ जुुट रही है। व्यापारियों का मानना है कि रविवार (11 जनवरी) को भीड़ अपने चरम पर होगी, क्योंकि इसके बाद लोग टुसू मेलों की ओर रुख करेंगे।  
बहरागोड़ा: हावड़ा हाट से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई धार

बहरागोड़ा के सैरात मैदान में शनिवार को ऐतिहासिक हावड़ा हाट का शुभारंभ हुआ। इस हाट का उद्घाटन स्थानीय विधायक समीर मोहंती और जिला परिषद अध्यक्ष बारी मुर्मू ने संयुक्त रूप से किया।

बिचौलियों पर नकेल: विधायक समीर मोहंती ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए कि इस हाट के संचालन में किसी भी प्रकार के बिचौलियों की भूमिका बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि हाट से मिलने वाला राजस्व सीधे सरकार के खाते में जाएगा, जिससे क्षेत्र के विकास कार्यों को गति मिलेगी।

500 से अधिक स्टॉल: जिला परिषद अध्यक्ष बारी मुर्मू ने बताया कि यह हाट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होगा। यहां 500 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं, जहां स्थानीय किसान, छोटे व्यापारी और स्व-सहायता समूहों की महिलाएं अपने उत्पाद बेच सकेंगी। यह आयोजन 15 जनवरी तक चलेगा।  
सांस्कृतिक महत्व: टुसू और मकर का मेल



कोल्हान में मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं, बल्कि खुशियों का साझा उत्सव है। पीठा (पकवान) की खुशबू और टुसू गीतों की गूंज अब गांवों से निकलकर शहरों तक पहुंच चुकी है। 14 जनवरी को मकर स्नान के बाद शुरू होने वाला मेलों का दौर पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांध देगा।
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