स्वास्थ्य विभाग की परामर्शदात्री समिति की मंजूरी से किडनी ट्रांसप्लांट का रास्ता साफ।
डिजिटल डेस्क, रांची। झारखंड के मरीजों के लिए बड़ी राहत। राज्य में पहली बार सरकारी और प्राइवेट दोनों स्तर पर किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू होने जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की परामर्शदात्री समिति ने 9 जनवरी को हुई बैठक में राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और राज अस्पताल, रांची को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मंजूरी दे दी है।
अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली इस बैठक में दोनों अस्पतालों को मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत योग्य पाया गया। लाइसेंस जल्द जारी होगा, जिससे राज्य के हजारों किडनी रोगी अब बाहर के राज्यों में नहीं जाएंगे।
यह फैसला मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना और आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना से जुड़े मरीजों के लिए गेम-चेंजर साबित होगा। अब तक ऐसे मरीज दिल्ली, मुंबई या चेन्नई जैसे शहरों में रेफर होते थे, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही उन्नत इलाज मिलेगा।
किडनी ट्रांसप्लांट की सर्जरी कैसी होती है?
किडनी ट्रांसप्लांट में स्वस्थ किडनी को डोनर (जीवित या मृत) से लेकर मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। सर्जरी आमतौर पर पेट के निचले हिस्से में की जाती है। भारत में यह प्रक्रिया काफी सुरक्षित और सफल है। सफल ट्रांसप्लांट के बाद मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं।
भारत में किडनी ट्रांसप्लांट के नियम क्या हैं?
ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एंड टिश्यूज एक्ट (THOA) 1994 (2011-2014 में संशोधित) के तहत सख्त नियम लागू हैं ताकि अंगों का अवैध व्यापार रोका जा सके।
- जीवित डोनर: डोनर “नियर रिलेटिव“ (माता-पिता, पति/पत्नी, भाई-बहन, बच्चे, दादा-दादी, पोते-पोतियां) हो सकता है। अगर नॉन-रिलेटिव है तो “अफेक्शन/अटैचमेंट“ का सबूत देकर अप्रूवल कमिटी से मंजूरी लेनी पड़ती है। डोनर 18+ उम्र का, स्वस्थ और स्वैच्छिक होना चाहिए।
- मृत डोनर (कैडेवर): ब्रेन डेथ के बाद परिवार की सहमति से संभव।
- अन्य नियम: केवल रजिस्टर्ड हॉस्पिटल और डॉक्टर ही ट्रांसप्लांट कर सकते हैं। NOTTO (नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन) इसे मॉनिटर करता है।
- स्वैप डोनेशन: अगर ब्लड ग्रुप मैच न हो तो दो जोड़ियों में किडनी स्वैप की सुविधा।
- सजा: अवैध ट्रेड पर 10 साल तक की जेल और जुर्माना
भारत में सालाना हजारों किडनी ट्रांसप्लांट होते हैं, सफलता दर 90-95% (1 साल में) तक पहुंचती है।
यह कदम झारखंड के स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को नई ऊंचाई देगा। ऑर्गन डोनेशन के बारे में जागरूकता फैलाएं, क्योंकि एक डोनेशन कई जिंदगियां बचा सकता है।
सरकारी और निजी क्षेत्र के ये अस्पताल संभालेंगे जिम्मेदारी
रिम्स रांची (RIMS): गरीबों के लिए संजीवनी राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति मिलना एक ऐतिहासिक कदम है। यहाँ आयुष्मान भारत और मुख्यमंत्री अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत मरीजों को पूरी तरह मुफ्त और कैशलेस इलाज की सुविधा मिल सकेगी।
अत्याधुनिक डायलिसिस यूनिट और नेफ्रोलॉजी विभाग के अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में अब गरीब से गरीब मरीज भी दिल्ली या चंडीगढ़ जाए बिना विश्वस्तरीय सर्जरी करा सकेंगे। सरकारी दर पर इलाज होने से मध्यम वर्ग के परिवारों पर भी आर्थिक बोझ कम होगा।
राज अस्पताल: निजी क्षेत्र में तकनीक और सुविधा का मेल वहीं निजी क्षेत्र में राज अस्पताल को ट्रांसप्लांट के लिए योग्य पाया गया है, जो उन मरीजों के लिए एक बड़ा विकल्प होगा जो कम वेटिंग पीरियड और अत्याधुनिक सुविधाओं को प्राथमिकता देते हैं।
मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (THOA) के कड़े मानकों पर खरा उतरने वाले इस अस्पताल में पोस्ट-ऑपरेटिव केयर (सर्जरी के बाद की देखभाल) और संक्रमण नियंत्रण के लिए विशेष आइसोलेशन वार्ड की व्यवस्था की गई है। यहाँ निजी स्तर पर इलाज के साथ-साथ गंभीर बीमारी योजनाओं के लाभार्थियों को भी नियमानुसार लाभ मिल सकेगा।
ट्रांसप्लांट से पहले क्या करें?
- ब्लड ग्रुप मैचिंग: डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप मैच होना पहली प्राथमिकता है।
- रिलेशनशिप प्रूफ: यदि डोनर परिवार का सदस्य है, तो आधार कार्ड, वंशावली या अन्य कानूनी दस्तावेज तैयार रखें।
- कमेटी अप्रूवल: दोनों अस्पतालों में ट्रांसप्लांट से पहले \“एथिक्स कमेटी\“ की मंजूरी अनिवार्य होगी।
- पंजीकरण: मरीजों को नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) के पोर्टल पर रजिस्टर करना होगा।
झारखंड के लिए क्यों है यह गेम-चेंजर?
आंकड़े: एक अनुमान के मुताबिक, झारखंड से हर साल लगभग 200-300 मरीज किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दक्षिण भारत या दिल्ली जाते हैं।
बचत: बाहर जाने पर इलाज के साथ-साथ रहने-खाने का खर्च भी 3-5 लाख अतिरिक्त बढ़ जाता है। अब यह खर्च शून्य हो जाएगा।
फॉलोअप में आसानी: ट्रांसप्लांट के बाद हर महीने डॉक्टर को दिखाना पड़ता है। स्थानीय सुविधा होने से मरीजों को सफर की थकान और जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा। |
|