पहाड़ों पर घटती बर्फ की चादर, वर्षा का इंतजार (फोटो: जागरण)
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में कड़ाके की ठंड तो जरूर पड़ रही है, लेकिन मैदान और पहाड़ अभी भी हिमपात को तरस रहे हैं। जबकि जनवरी पहले पखवाड़े के करीब पहुंचने वाली है, लेकिन बारिश का कोई अता पता नहीं है। हिमपात भी नाममात्र हुआ है। बिजली उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा है। करीब 77 प्रतिशत उत्पादन घट चुका है। पानी से लबालब भरे रहने वाले नदी-नाले सूख चुके हैं। अक्टूबर से 31 दिसंबर 2025 तक बारिश सामान्य से 40 प्रतिशत कम हुई है। लंबे समय तक सूखा बागों और फलों की फसलों की गुणवत्ता, पैदावार प्रभावित करेगा।
बता दें कि मौसम विभाग के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में पहली अक्टूबर से 31 दिसंबर 2025 तक 77.5 मिलीमीटर बारिश हुई। इस दौरान सामान्य तौर पर 127.7 मिलीमीटर बारिश हुई है। श्रीनगर में सामान्य से 50 प्रतिशत व शोपियां व कुलगाम जिलों में क्रमश: 78 व 65 प्रतिशत बारिश कम हुई है। दिसंबर 2025 के अंत में प्रदेश के उच्च पर्वतीय इलाकों में हिमपात हुआ है, लेकिन उसके बाद से हिमपात के लिए पूरा प्रदेश तरस रहा है। गत दिसंबर में जो हिमपात हुआ है, वह कम है। उसके ज्यादा देर तक जमे रहने की संभावना भी बहुत कम है।
विश्वप्रसिद्ध भूमि एवं जलवायु विज्ञानी और इस्लामिक यूनिवर्सिटी आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी अवंतीपोरा के उपकुलपति प्रो शकील रोमशू ने कहा कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का असर साफ नजर आने लगा है। पहले कश्मीर में सर्दियों में अक्टूबर से मार्च के अंत तक ज्यादातर समय बारिश नहीं हिमपात होता था। कभी कभार निचले क्षेत्रों में बारिश होती थी। अब चिल्ले कलां (अधिक सर्द दिन) में भी हिमपात कम हो रहा है।
यहां सामान्य से ज्यादा पतझड़ हो रहा है। सर्दियों में तापमान पहले से ज्यादा हो रहा है। फरवरी से मार्च में अगर देखें तो आपको तापमान पहले की अपेक्षा ज्यादा महसूस होगा। इससे पहाड़ों पर बर्फ जमती नहीं है। वह पहले ही पिघलने लगती है। हम दो-तीन दशक पहले की बात करें या आप कश्मीर के किसी भी पुराने बुजुर्ग से बात करें या मौसम विभाग का रिकार्ड देखें तो आप पाएंगे कि पहले अप्रैल तक तापमान ज्यादा नहीं होता था।
पहाड़ों पर बर्फ लंबे समय तक जमी रहती थी। आप देखें तो पहाड़ों पर जो बर्फ पड़ी है, उसकी मोटाई कम है। वह पिघल रही है। आने वाले समय में दरियों में पानी की कमी में होगा। ग्लेशियरों का दायरा घट रहा है। एक सदी में कश्मीर में औसतन तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई है।
जम्मू कश्मीर ऊर्जा विकास निगम के एक अधिकारी ने कहा कि सूखे के कारण जलविद्युत उत्पादन 77 प्रतिशत कम हो चुका है। हमारी कुल क्षमता 1197 मेगावाट है और 277 मेगावाट ही पैदा कर रहे हैं। बगलिहार जलविद्युत परियोजना 900 मेगावाट की तुलना में 129 मेगावाट पैदा कर रही है। यह स्थिति एनएचपीसी के अधीनस्थ परियोजनाओं की है। जो ऊर्जा विकास निगम की परियोजनाएं हैं वह सिर्फ 80 मेगावट तक पैदा कर रही है।
जम्मू के इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स (आइपीपी) ने 10 मेगावाट बिजली पैदा कर रही हैं। कश्मीर में 58 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। पीक डिमांड के समय 34 प्रतिशत बिजली कम रहेगी। जैसा कि पहले ही बताया गया है, जनवरी में पीक डिमांड के दौरान जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में 34 परसेंट से ज़्यादा बिजली की कमी होने की संभावना है।
पर्यावरण विशेषज्ञ और एसपी कालेज श्रीनगर में पर्यावरण विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर डा सुहैब बंड ने कहा कि सर्दियों में होने वाला हिमपात ही जम्मू कश्मीर में गर्मियों के लिए विशेषकर कश्मीर घाटी में पानी-सिंचाई का मुख्य आधार है। बागवानी और कृषि पूरी तरह सर्दियों के हिमपात पर निर्भर करती है। लंबे समय तक सूखा मौसम बागों और फलों की फसलों के लिए गंभीर खतरा है, जो कश्मीर की आर्थिक रीढ़ हैं। सूखे के मौसम से सिंचाई का प्राकृतिक चक्र बिगड़ जाता है। |
|