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आसमान में रंगीन रोशनी का रहस्य: कैसे बनती है ...

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रात के आसमान में दिखने वाले नॉर्दर्न और सदर्न लाइट्स के अद्भुत नजारे सबका मन मोह लेते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि इन खूबसूरत रंगों के पीछे की वजह क्या है?  
आसमान के कैनवास पर थिरकती जीवंत हरी और बैंगनी रोशनियों के जादुई दृश्य ने हाल के वर्षों में दुनिया भर का ध्यान खींचा है. उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर दिखने वाले इस नजारे को आधिकारिक तौर पर ‘ऑरोरा बोरियालिस' और ‘ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस' कहा जाता है. इसे देखने के लिए अब बाकायदा टूर आयोजित किए जा रहे हैं और लोग ट्रैकिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस नजारे की खूबसूरती जगजाहिर है, पर यहां कुछ ऐसी बातें हैं जो शायद आप इन नॉर्दर्न और सदर्न लाइट्स के बारे में न जानते हों.  




अलग-अलग रंगों का क्या कारण है?  
सूरज की सतह पर रह-रहकर बड़े विस्फोट होते रहते हैं, जिन्हें सौर तूफान कहा जाता है. इन विस्फोटों से बिजली से चार्ज पार्टिकल्स यानी कण की विशाल लहरें निकलती हैं. इस प्लाज्मा का कुछ हिस्सा सफर करता हुआ पृथ्वी की ओर आता है और हमारे ग्रह के चुंबकीय ध्रुवों की ओर खिंचा चला जाता है.  
रॉयल म्यूजियम ग्रीनविच वेबसाइट पर एस्ट्रोनॉमर टॉम केर्स ने बताया, "ये पार्टिकल्स पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद परमाणुओं और अणुओं से बहुत तेजी से टकराते हैं और उन्हें गर्म कर देते हैं. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी गैस को गर्म करके उसे चमकाया जा रहा हो.”  




रोशनी के अलग-अलग रंग वायुमंडल में मौजूद तत्वों पर निर्भर करते हैं. हमारे वायुमंडल में ऑक्सीजन लगभग 21 फीसदी है. यह गर्म होने पर हरा रंग छोड़ती है. जबकि नाइट्रोजन की वजह से बैंगनी, नीला या गुलाबी रोशनी निकलती है. बहुत अधिक ऊंचाई पर जब ये कण ऑक्सीजन के साथ टकराते हैं, तो कभी-कभी रोशनी का रंग गहरा लाल भी हो जाता है, लेकिन ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है.  
ये रोशनी कहां दिखाई देती हैं?  
रोशनी का यह शानदार नजारा आमतौर पर सिर्फ आर्कटिक सर्कल के पास ही दिखता है या दक्षिणी ध्रुव यानी ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस के मामले में अंटार्कटिका के आसपास. लेकिन हम अभी शक्तिशाली सनस्पॉट्स और लपटों के 11 साल के चक्र से गुजरे हैं, जिसे ‘सोलर मैक्सिमम' कहा जाता है. इस दौरान, इन रोशनियों ने ध्रुवों से बहुत दूर तक के आसमान को भी रंगों से सराबोर कर दिया है.  




नॉर्वे के आर्कटिक द्वीपसमूह स्वालबार्ड में ऊपरी वायुमंडलीय भौतिकी की शोधकर्ता केटी हर्लिंगशॉ ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब सूरज से ज्यादा ऊर्जा आती है, तो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के घेरे बड़े हो जाते हैं और फैलने लगते हैं.”  
हाल ही में हंगरी, स्विट्जरलैंड और अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के साथ-साथ दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी ये नजारे देखे गए हैं. ‘स्पेस वेदर फिजिसिस्ट' तमिथा स्कोव ने अक्टूबर 2025 में स्पेस डॉट कॉम को बताया, "लगभग हर सौर चक्र में ऐसा होता है. जब ये चक्र खत्म होने की कगार पर होते हैं, तब भी शक्तिशाली सौर गतिविधियां देखी जा सकती हैं.”  




वह बताती हैं, "आमतौर पर, ये आखिरी लहरें ‘सोलर मिनिमम' से दो-तीन साल पहले देखने को मिलती हैं. इसलिए, अगले डेढ़ से दो साल के भीतर हमें फिर से कुछ ऐसा ही शानदार नजारा देखने को मिल सकता है.”  
क्या नॉर्दर्न लाइट्स खतरनाक भी हो सकती हैं?  
नॉर्वे के स्वालबार्ड में दुनिया के सबसे उत्तरी ऑरोरा स्टेशन ‘केजेल हेनरिकसेन ऑब्जर्वेटरी' के रिसर्चर नॉर्दर्न लाइट्स में मौजूद सोलर एनर्जी पार्टिकल्स और ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने की उनकी क्षमता की जांच कर रहे हैं.  

इस ऑब्जर्वेटरी में एटमॉस्फेरिक फिजिसिस्ट (वायुमंडलीय भौतिक विज्ञानी) नूरा पार्टामीज ने डीडब्ल्यू को बताया, "ध्रुवीय क्षेत्रों में कभी-कभी ऑरोरा बोरियालिस की वजह से ‘ओजोन परत में बड़ी गिरावट' देखने को मिलती है. ओजोन परत पृथ्वी की सतह से लगभग 15 से 30 किलोमीटर ऊपर गैस की एक पतली परत है. यह सूरज की तेज रेडिएशन से हमारी रक्षा करने वाली मुख्य ढाल है.  
पार्टामीज कहती हैं, "गिरावट का स्तर अलग-अलग हो सकता है. सूरज से आने वाले कुछ प्रोटॉन इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी वायुमंडल (स्ट्रैटोस्फीयर) में ओजोन को 50 से 70 फीसदी तक खत्म कर सकते हैं. यह नुकसान हफ्तों तक बना रह सकता है, जिसके बाद प्रकृति धीरे-धीरे इसे खुद ठीक कर लेती है.”  

क्या नॉर्दर्न लाइट्स सिर्फ पृथ्वी पर ही दिखती हैं?  
भले ही उन्हें देख पाना थोड़ा मुश्किल हो, लेकिन ऑरोरा लाइट्स हमारे सौरमंडल के लगभग सभी ग्रहों पर देखे गए हैं. इनका आकार और चमक कितनी होगी, यह उस ग्रह के वायुमंडल और उसके चुंबकीय क्षेत्र की ताकत पर निर्भर करता है.  
मंगल ग्रह पर स्थिति थोड़ी अलग है. पृथ्वी की तरह वहां पूरे ग्रह को ढंकने वाला चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे स्थानीय क्षेत्र हैं जो मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में पाए जाते हैं. यही वजह है कि वहां यह रोशनी वाला नजारा किसी एक जगह के बजाय ज्यादा फैला हुआ होता है.  

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के निक श्नाइडर ने नासा को बताया, "मंगल ग्रह के आसमान में एक धुंधली हरी चमक दिखना काफी हद तक मुमकिन है, खासकर जब सूरज से एनर्जी वाले पार्टिकल्स निकल रहे हों.”  
दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की कक्षा में घूम रहे अंतरिक्ष यात्री भी इस अद्भुत नजारे के गवाह बनते हैं. उनका नजरिया दुनिया से अलग होता है क्योंकि वे न सिर्फ इसे ऊपर से देखते हैं, बल्कि कभी-कभी उनका स्टेशन सीधे इन नाचती हुई रोशनियों के बीच से होकर गुजरता है.  

नॉर्दर्न लाइट्स को देखकर सीटी क्यों नहीं बजानी चाहिए?  
ऑरोरा बोरियालिस को देखे जाने के शुरुआती रिकॉर्ड करीब 3,000 साल पुराने हैं. 10वीं सदी ईसा पूर्व के एक चीनी लेख में इसका जिक्र मिलता है. इसमें बताया गया है कि रात के समय उत्तरी आकाश में 'पांच रंगों' वाली एक अजीब रोशनी देखी गई थी.  
सदियों से, प्रकृति के इस करिश्मे ने दुनिया भर के लोगों को हैरान किया है. इसका नाम ‘ऑरोरा' सुबह की रोमन देवी के नाम पर पड़ा है. ‘बोरियालिस' शब्द उत्तर की ठंडी हवाओं के ग्रीक देवता ‘बोरियास' से लिया गया है. पुराने समय में लोग इन जादुई रोशनियों को ईश्वर का कोई इशारा या कोई भविष्यवाणी मानते थे.  

प्राचीन नॉर्डिक कहानियों में माना जाता था कि ऑरोरा बोरियालिस असल में ‘वॉल्किरीज' के कवच और भालों से निकलने वाली चमक है. ये वे योद्धा महिलाएं थीं जो युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को वीरगति के बाद स्वर्ग के समान ‘वलहाल्ला' ले जाती थीं. कुछ लोग यह भी मानते थे कि यह ‘बाईफ्रोस्ट ब्रिज' है, एक जादुई इंद्रधनुषी पुल जो धरती को देवताओं के घर से जोड़ता है.  
नॉर्दर्न लाइट्स के लिए फिनिश भाषा में जो शब्द है, उसका मतलब है ‘लोमड़ी की आग (फॉक्स फायर)'. यह एक जादुई और रहस्यमयी लोमड़ी की याद दिलाता है जिसकी पूंछ में आग लगी होती है. माना जाता था कि जब वह पहाड़ों और मैदानों में दौड़ती थी, तो उसकी पूंछ से बर्फ के कण उछलकर आसमान में पहुंच जाते थे, जिससे पूरा आकाश रोशनी से जगमगा उठता था.  

मूल अमेरिकन और इनुइट कहानियों में इन रोशनियों को सृष्टिकर्ता देवताओं, दुष्ट राक्षसों या मृत पूर्वजों और बच्चों की आत्माओं से जोड़कर देखा जाता था. लैपलैंड के सामी लोगों से लेकर उत्तरी अमेरिका के कबीलों तक, कई संस्कृतियों में इन रोशनियों का सम्मान किया जाता था और इनसे डरा भी जाता था. मान्यता थी कि इन्हें देखकर सीटी बजाने जैसी छोटी सी बात भी आत्माओं के गुस्से को भड़का सकती थी. माना जाता था कि वे नीचे आकर उस लापरवाह इंसान को अपने साथ ले जा सकते थे.










Deshbandhu Desk




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