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महागठबंधन में गहराया मतभेद, कांग्रेस और RJD अलग-अलग मुद्दों पर आमने-सामने

deltin33 2026-1-12 05:27:30 views 1264
  

बिहार में अब महागठबंधन महज कागजी।  



विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। बयानों से बढ़कर महागठबंधन में खटास अब क्रिया-कलाप के रूप में भी दिखने लगा है। एकजुट आंदोलन तो दूर की कौड़ी है, घटक दल किसी मुद्दे पर एकसुर भी नहीं हो रहे।

ताजा उदाहरण मनरेगा और बिहार निवास के संदर्भ में जताया जाने वाला विरोध है। एक पर कांग्रेस तो दूसरे पर राजद मुखर है, लेकिन दोनों एक साथ नहीं।

मनरेगा पर तो कांग्रेस अपनी हैसियत में राज्य-व्यापी आंदोलन कर रही, लेकिन RJD उसके साथ नहीं। बिहार निवास तोड़े जाने पर राजद आगबबूला है, जबकि कांग्रेस मौन साधे हुए है।

किशनगंज में आर्मी कैंप के लिए कथित तौर पर खेतिहर भूमि लिए जाने के विरोध में भी कांग्रेस को राजद का साथ नहीं मिल रहा। वाम दल तो अभी इन दोनों से कन्नी काटे हुए हैं।  

  • मनरेगा में परिवर्तन और आर्मी कैंप के लिए चिह्नित भूमि के विरुद्ध आंदोलन में कांग्रेस को राजद का साथ नहीं
  • बिहार निवास को तोड़ने के विरोध और सरकार से हिसाब-किताब में राजद की रणनीति पर कांग्रेस की हामी नहीं


इस खटास की बुनियाद वस्तुत: विधानसभा चुनाव के दौरान ही पड़ गई थी। परिणाम यह हुआ कि दर्जन भर सीटों पर दोस्ताना संघर्ष की नौबत बन आई।

इस खींचतान ने एनडीए की राह और आसान कर दी, जिसने इस बार 2010 के विधानसभा चुनाव के बाद दूसरी बड़ी जीत दर्ज कराई। महागठबंधन मात्र 35 सीटों पर सिमट गया। हार के बाद घटक दलों में आरोप-प्रत्यारोप कुछ और तेज हो गया।

पिछले दिनों प्रियंका गांधी के साथ प्रशांत किशोर की हुई मुलाकात के बाद कांग्रेस के कई नेता राजद को बोझ बताने लगे। शकील अहमद खान आदि ने खुलकर कहा कि इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई लाभ नहीं।

अपनी अलग राह चुनकर अब राजनीतिक पहचान बचानी चाहिए। प्रतिक्रिया में राजद ने भी कांग्रेस को जनाधार-हीन और उसकी बैसाखी के सहारे बताया।

हालांकि, दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व से कोई आक्रामक बयान नहीं आया, फिर भी तनाव बना हुआ है। आने वाले दिनों में राज्यसभा और विधान परिषद की सीटों के लिए होने वाले चुनाव के दौरान इस तनाव के और गहराने की आशंका है।

अलग-अलग मुद्दों और आंदोलन से इसका संकेत मिल रहा। हालांकि, कांग्रेस में अपने शुभेच्छुकों के भरोसे राजद अपना हित सुरक्षित मान रहा।

राजद की अपनी ढफली, कांग्रेस का अपना राग : बहरहाल, नेपाल और बांग्लादेश के निकटस्थ सीमांचल में आर्मी का बेस कैंप के लिए चिह्नित भूमि को खेतिहर बताते हुए कांग्रेस अधिग्रहण का विरोध जता रही।

इसमें एआइएमआइएम भी उसके साथ है, लेकिन राजद नहीं। सीमांचल में मुसलमानों की बहुलता है, जबकि कांग्रेस एक बार फिर अपने पुराने जनाधार (सवर्ण, अनुसूचित जाति, मुसलमान) के लिए व्याकुल है।

राजद की राजनीति यादवों के साथ मुसलमानों के दम पर है। अब कांग्रेस यहां राजद को नंगा करेगी। राजद पर अंगुली उठाने के लिए उसके पास दूसरा मुद्दा मनरेगा का है, जिसके स्वरूप में परिवर्तन हो चुका है।
श्रेय लेने तक बात, आंदोलन से दूरी   

मनरेगा कांग्रेस की देन है, जिसका श्रेय राजद रघुवंश प्रसाद सिंह को देता रहा है, जो डाॅ. मनमोहन सिंह की तत्कालीन सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री हुआ करते थे।

अब उसी योजना से संबंधित कांग्रेस के आंदोलन में राजद सहभागी नहीं। इस बीच दिल्ली में बिहार निवास को तोड़कर नया भवन बनाए जाने से राजद आक्रोशित है।

इसे वह लालू प्रसाद (RJD Supremo Lalu Prasad) के नाम वाले शिलापट्ट को मिटाने का षड्यंत्र बता रहा। 1994 में जब बिहार निवास बना था, तब लालू मुख्यमंत्री हुआ करते थे।

इस मुद्दे पर राजद से कांग्रेस एकसुर नहीं। सौ दिन पूरे होने पर नीतीश सरकार के कामकाज का राजद हिसाब-किताब करेगा। तेजस्वी यादव की इस रणनीति पर भी अभी कांग्रेस ने हामी नहीं भरी है।
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