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भारत में पुरानी घड़ियों का बढ़ा क्रेज, आखिर विंटेज वॉच के प्रति युवाओं की क्यों बढ़ी दीवानगी?

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भारत में पुरानी घड़ियों का बढ़ा क्रेज (फाइल फोटो)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 13 वर्षों तक वरुण जशनानी एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करते रहे, जिसके बारे में उन्हें सिर्फ इतना ही पता था कि उसका नाम \“एन भौमिक\“ है। यह नाम 1930 से पहले बनी फेवरे लेउबा सी-चीफ घड़ी के स्टील केसबैक पर खुदा हुआ है।

एन भौमिक की मिल्कियत वाली यह घड़ी, पुरानी घड़ियों के बाजार के गुप्त रास्तों से होते हुए त्रिशूर से बायकुला की एक छोटी सी घड़ी की दुकान पर 2011 में पहुंची, जिसे वरुण जशनानी ने खरीद लिया। उस समय जशनानी की उम्र 24 वर्ष थी।
यांत्रिक घड़ी ने किया आकर्षित

वरुण जशनानी ने बताया कि 2011 में उन्होंने जब पहली पीढ़ी की एचएमटी कोहिनूर घड़ी को खरीदा, तो मैं इस यांत्रिक घड़ी के रूप और अनुभव से मोहित हो गया था। क्योंकि यह बाजार में मौजूद क्वार्ट्ज घड़ियों से बिल्कुल अलग थी। यह एक ऐसी घड़ी थी जिससे आप जुड़ सकते थे। उस समय इस घड़ी की कीमत मात्र 2,000 रुपये थी।

  

इस आकर्षण ने उन्हें यांत्रिक कलाई घड़ियों पर शोध करने और उन्हें इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया, आज, उनकी 110 घड़ियों के संग्रह का एक बड़ा हिस्सा यांत्रिक घड़ियों से बना है, जिनमें से 105 विंटेज हैं।

क्वार्ट्ज क्राइसिस के बाद दुर्लभ हो गईं यांत्रिक घड़ियां अब न सिर्फ इतिहास की गवाह हैं, बल्कि स्टाइल, क्राफ्ट और विरासत का प्रतीक भी। जूड डी सूजा, द रिवॉल्वर क्लब (टीआरसी) के संस्थापक, कहते हैं, ये घड़ियां उस दौर की याद दिलाती हैं जब कंपनियां जोखिम लेती थीं और व्यक्तिगतता को महत्व दिया जाता था।
टीआरसी ने तीन साल पहले शुरू किया कारोबार

टीआरसी ने तीन साल पहले घड़ियों का कारोबार शुरू किया। शुरू में सिर्फ एचएमटी पर फोकस था, जहां 1,500-2,000 रुपये में 40-50 घड़ियां दो दिनों में बिक जाती थीं। आज कैटलॉग में एचएमटी, सिटिजन, सेइको से लेकर ओमेगा, रोलेक्स और सोवियत-युग की राकेटा-जारिया तक शामिल हैं।

  
लौट रहा है पुराना दौर?

भारत में एक बार फिर पुरानी घड़ियों का क्रेज बढ़ गया है। आज के जमाने में विंटेज घड़ियों के शौकीन लोग इन मॉडलों की तलाश में बाजार छान मारते हैं। \“द रिवॉल्वर क्लब\“ के संस्थापक जूड डी सूज़ा के अनुसार, यह उस दौर की याद दिलाती हैं जब घड़ियां मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि बेजोड़ शिल्प कौशल और जोखिम उठाने वाले डिज़ाइनों के लिए बनाई जाती थीं। 1970 के दशक के \“क्वार्ट्ज़ संकट\“ ने भले ही कई स्विस कंपनियों को बंद कर दिया, लेकिन जो यांत्रिक घड़ियां बच गईं, वे आज दुर्लभ और बेशकीमती रत्न बन चुकी हैं।

वरुण जशनानी के अनुसार, घड़ी की स्थिति, उसका डिजाइन और उसकी दुर्लभता ही आमतौर पर हमें उसकी ओर आकर्षित करती है। 25 साल से कम के युवा 10,000 रुपये तक विंटेज घड़ियां खरीदने के लिए खर्च कर रहे हैं, जबकि 35 साल से अधिक के लोग 1-2 लाख तक खर्च कर रहे हैं। क्योंकि, विंटेज घड़ियों को अक्सर लग्जरी घड़ियों की दुनिया में प्रवेश का माध्यम माना जाता है।
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