search

राजा, रियासत, तीन रानियां… फिर भी सूनी रही गोद, दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह और अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी की अधूरी विरासत

deltin33 2026-1-12 12:26:34 views 1142
  



राधा कृष्ण, पटना। मिथिला की शान कहे जाने वाले दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही एक पूरे युग का पटाक्षेप हो गया। लगभग 94–95 वर्ष की आयु में उन्होंने दरभंगा राज परिसर स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। ब्रेन हेमरेज और ब्लड क्लॉटिंग के कारण लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं महारानी के जाने से न सिर्फ राजघराने में, बल्कि पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उनका जीवन राजसी वैभव, सामाजिक सेवा, कानूनी संघर्ष और अंततः सादगी में ढले आधुनिक युग की कहानी है।
दरभंगा राज: शान, दौलत और दान का प्रतीक

दरभंगा राज की स्थापना 1556 में महेश ठाकुर ने की थी। यह रियासत करीब 8380 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली थी और लंबे समय तक मिथिला की सांस्कृतिक, राजनीतिक और शैक्षणिक धुरी रही। इस राजघराने का नाम भारत ही नहीं, विदेशों तक अदब और सम्मान से लिया जाता था।


दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह न केवल अपार संपत्ति के स्वामी थे, बल्कि वे शिक्षा, कला और दान के बड़े संरक्षक भी थे।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को दिए गए उनके दान आज भी इतिहास में दर्ज हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने देश के लिए 14 हजार तौला सोना दान किया था, जिसे लेने स्वयं तत्कालीन वित्त मंत्री दरभंगा आए थे।
तीन शादियां, फिर भी कोई उत्तराधिकारी नहीं

इतने वैभव के बावजूद दरभंगा राज की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि महाराज कामेश्वर सिंह की तीन शादियां हुईं, लेकिन किसी से भी संतान नहीं हुई।


उनकी पहली पत्नी थीं महारानी राजलक्ष्मी, दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया और तीसरी व अंतिम पत्नी महारानी कामसुंदरी देवी।


मंझली पत्नी कामेश्वरी प्रिया से महाराज का विशेष स्नेह था। दोनों के बीच सिर्फ पति-पत्नी का नहीं, बल्कि सहयोगी और समान सोच रखने वाले साथियों का रिश्ता था।

कहा जाता है कि कामेश्वरी प्रिया ने समाज सेवा के लिए अपनी बेशकीमती रॉयल्स रॉयस कार तक दान कर दी थी। लेकिन 1939 में उनकी असामयिक और रहस्यमयी मृत्यु ने दरभंगा राज की उत्तराधिकार की संभावनाओं को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
अधूरी रह गई प्रेम और उत्तराधिकार की कहानी

मिथिला समाज में यह धारणा रही है कि महारानी कामेश्वरी प्रिया संभवतः गर्भवती थीं। उनकी अचानक मृत्यु ने महाराज को भीतर तक तोड़ दिया। इसके बाद उनके और बड़ी महारानी राजलक्ष्मी के बीच दूरी बढ़ती चली गई।


कहा जाता है कि मंझली पत्नी की मृत्यु के बाद महाराज जीवन के अंतिम समय तक भावनात्मक रूप से अकेले रहे। यही अकेलापन उन्हें दान, सेवा और सामाजिक कार्यों की ओर और अधिक ले गया।


महारानी कामसुंदरी देवी।
महारानी कामसुंदरी देवी: शाही वैभव से आधुनिक संघर्ष तक

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 1930 के दशक में हुआ था और 1940 के दशक में उनका विवाह महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह से हुआ।

महाराज का निधन 1962 में हो गया, जिसके बाद महारानी पर न केवल राजघराने की स्मृतियों को सहेजने, बल्कि संपत्ति और ट्रस्ट से जुड़े लंबे कानूनी संघर्षों का बोझ भी आ पड़ा।


वह दरभंगा राज की अंतिम जीवित महारानी थीं। उन्होंने महाराजा की स्मृति में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके माध्यम से मिथिला की सांस्कृतिक, साहित्यिक और शैक्षणिक विरासत को संरक्षित किया गया।


महाराज की निजी लाइब्रेरी, जिसमें 15 हजार से अधिक दुर्लभ किताबें और पांडुलिपियां थीं, उसे आम जनता के लिए खोला गया। यह कार्य उनके सामाजिक दायित्व और दूरदर्शिता का प्रमाण है।
संपत्ति विवाद और बदलता समय

स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और बदलती राजनीति ने दरभंगा राज को गहरे संकट में डाल दिया। इमरजेंसी के दौर में राजघराने की कई संपत्तियां सरकारी नियंत्रण में चली गईं।


बड़ी महारानी की डायरी में इस दौर का दर्द साफ झलकता है, जिसमें सरकारीकरण और कथित रिश्वत के आरोपों का जिक्र मिलता है।


हालांकि, 2025 में दरभंगा ट्रस्ट से जुड़ा 47 साल पुराना विवाद समाप्त हुआ और अदालत ने फैसला दिया कि महारानी के निधन के बाद राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह ट्रस्टी होंगे।
अंतिम दिन और निधन

पिछले कुछ महीनों से महारानी की तबीयत लगातार खराब चल रही थी। सितंबर 2025 में बाथरूम में फिसलने के बाद उन्हें ब्रेन हेमरेज और ब्लड क्लॉटिंग की समस्या हुई।

उन्हें दरभंगा के एक निजी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, लेकिन जनवरी 2026 तक उनकी सेहत में सुधार नहीं हुआ। अंततः उन्होंने कल्याणी निवास में ही अंतिम सांस ली।


उनके निधन की खबर फैलते ही राजघराने से जुड़े लोग, स्थानीय नागरिक और मिथिला के सामाजिक संगठन कल्याणी निवास पहुंचे।
शोक, श्रद्धांजलि और एक युग का अंत

बिहार के कई राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महारानी के निधन पर शोक व्यक्त किया। युवराज कपिलेश्वर सिंह ने इसे परिवार के लिए अपूरणीय क्षति बताया।


महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक शाही परिवार ने समय के साथ वैभव खोया, लेकिन संस्कार, सेवा और स्वाभिमान नहीं छोड़ा।

दरभंगा राज की कहानी आज भी मिथिला की स्मृतियों में जीवित है, एक ऐसी रियासत, जहां अपार धन, तीन रानियां और असीम दानशीलता थी, लेकिन एक उत्तराधिकारी की कमी हमेशा सताती रही।

महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही वह अध्याय भी बंद हो गया, जो राजसी वैभव से आधुनिक संघर्ष तक की पूरी गाथा अपने भीतर समेटे हुए था।
like (0)
deltin33administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin33

He hasn't introduced himself yet.

1510K

Threads

0

Posts

4710K

Credits

administrator

Credits
477351