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नारियल छिलके को कचरा समझकर न फेंके, पटना में बन रहा रोजगार का माध्यम; कोकोपीट-रस्सी का हो रहा निर्माण

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कच्चे नारियल के छिलकों से हो रहा कोकोपीट और रस्सी का निर्माण। फोटो जागरण



मनीष कुमार, पटना। राजधानी में कचरे के रूप में फेंके जाने वाले कच्चे नारियल (डाभ) के छिलके अब पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का माध्यम बन रहे हैं। नगर निगम ने नारियल कचरे के पुन: उपयोग की पहल करते हुए इससे कोकोपीट और कायर रस्सी का निर्माण शुरू कराया है। इस पहल से जहां कचरे की मात्रा में कमी आ रही है, वहीं नगर के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को भी मजबूती मिल रही है।

नगर निगम के अनुसार, राजधानी में गर्मी के मौसम में प्रतिदिन 10 से 12 टन तथा ठंड के दिनों में दो से ढाई टन तक कच्चे नारियल के छिलके कचरे में निकलते हैं। पहले ये छिलके सड़कों के किनारे, नालियों में या अन्य कचरे के साथ फेंक दिए जाते थे। इससे न केवल दुर्गंध और अस्वच्छता फैलती थी, बल्कि फफूंद, मच्छरों के पनपने और जलजमाव की समस्या भी बढ़ जाती थी। साथ ही नगर निगम के कचरा संग्रहण और कचरा भराव क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा था।

गौरतलब है कि 12 जनवरी को आयोजित नगर निगम की सशक्त स्थायी समिति की 19वीं साधारण बैठक में कच्चे नारियल के छिलकों के वैज्ञानिक प्रसंस्करण के लिए एजेंसी चयन, दर निर्धारण तथा आवश्यक नीतिगत निर्णयों से जुड़ी कार्ययोजना को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई है। नगर निगम नारियल कचरे से कोकोपीट के साथ-साथ जैविक उर्वरक और अन्य उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहा है। कचरे के पुनर्चक्रण से स्वच्छता में सुधार हो रहा है।
दानापुर में स्थापित संयंत्र में हो रहा प्रसंस्करण

नगर आयुक्त यशपाल मीणा के नेतृत्व में नारियल अपशिष्ट प्रबंधन की इस पहल को धरातल पर उतारा गया है। दानापुर रेलवे स्टेशन के पास वार्ड-40 में स्टार्टअप के जरिये एक विशेष संयंत्र स्थापित किया गया है। इस संयंत्र की वर्तमान क्षमता 10 टन प्रतिदिन है, जहां फिलहाल नगर निगम के तीन अंचलों पाटलिपुत्र, नूतन राजधानी और बांकीपुर से आने वाले नारियल कचरे का प्रसंस्करण किया जा रहा है।

शेष तीन अंचलों कंकड़बाग, अजीमाबाद और पटना सिटी के लिए अलग संयंत्र स्थापित करने की भी योजना तैयार की जा रही है। नगर निगम के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विशेषज्ञ अरविंद कुमार ने बताया कि नारियल के छिलकों को अलग-अलग चरणों में प्रोसेस कर उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है। इससे न केवल कचरा कम हो रहा है, बल्कि इससे मूल्यवर्धित उत्पाद भी तैयार हो रहे हैं।
ऐसे होता है नारियल कचरे का रूपांतरण

संयंत्र में नारियल कचरे के संग्रहण के बाद उसकी छंटाई और सफाई की जाती है। इसके बाद छिलकों को कतर कर रोटरी ड्रायर में सुखाया जाता है। सूखने के बाद छनाई और धूल पृथक्करण की प्रक्रिया होती है। फिर कोकोपीट का प्रसंस्करण और पैकेजिंग की जाती है। इसके समानांतर फाइबर निकालकर उससे कायर रस्सियों का निर्माण किया जाता है। तैयार उत्पादों को भंडारण के बाद बाजार और उपयोगकर्ताओं तक भेजा जाता है। प्रसंस्करण में करीब 80 प्रतिशत कोकोपीट, जबकि फाइबर से शेष रस्सियां प्राप्त होती हैं।
खेती और बागवानी में बढ़ रही मांग

संयंत्र से तैयार कोकोपीट का उपयोग कृषि, बागवानी और वानिकी में किया जा रहा है। खासकर छत पर बने गार्डन, नर्सरी और शहरी बागवानी में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। कोकोपीट मिट्टी में नमी बनाए रखने, पौधों की जड़ों को पोषण देने और उत्पादन बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वहीं कायर रस्सियों का उपयोग निर्माण कार्य, पैकेजिंग और हस्तशिल्प उत्पादों में किया जा रहा है।
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