
सौरभ विजयवर्गीय सुबह के नौ बजे हैं। ट्रैफिक ऐसे रेंग रहा है जैसे दिन पहले ही थक चुका हो। सूरज निकलने के काफी देर बाद तक गाड़ियों की हेडलाइटें जली रहती हैं। ऊँची इमारतें कुछ मंज़िलों के बाद धुंधले ग्रे धुएँ में गायब हो जाती हैं। खेल के मैदान सूने पड़े हैं। बच्चे स्कूल बस का इंतज़ार करते हुए आँखों में पानी और गले में खराश के साथ खड़े हैं। वे धीरे-धीरे खाँसते हैं और मन ही मन सोचते हैं कि आज बस आएगी भी या नहीं। अब यह कोई असाधारण या नाटकीय दृश्य नहीं रहा। भारत के कई... |