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आज नेताजी जयंती: बोस बाबू, झारखंड और आज़ादी का रास्ता, 1928 से 1941 तक की अनकही कहानी

deltin33 Yesterday 10:56 views 60
  

गोमो स्टेशन से आज़ादी की ट्रेन: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में जंक्शन का नाम बदला गया।



डिजिटल डेस्क, रांची। आज सुझाष चंद्र बोस की जयंती है। राष्ट्र बोस दो का याद कर रहा है। झारखंड से उनका खास लगाव रहा था। बोस की झारखंड यात्राएं 1928 से शुरू हुईं और 1941 तक चलीं। वे रांची से धनबाद तक कई जगह गए।

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेता और मजदूर यूनियन लीडर्स उनके टच में रहते थे। धनबाद में उनके चाचा अशोब बोस बरारी कोक प्लांट में कार्यरत थे। यहीं से गोमो (तत्कालीन नाम) स्टेशन जा कर आखिरी बार ट्रेन पकड़े अंग्रेजों की पकड़ से बाहर निकले और अंग्रेजों के खिलाफ विदेश की धरती से जंग लड़ते रहे। दोबारा देश उनको नहीं देख पाया।


वरिष्ठ पत्रकार राकेश परिहार बताते हैं- नेताजी सुभाष चंद्र बोस की झारखंड (तत्कालीन बिहार प्रांत का हिस्सा) से गहरी कड़ी थी, जो 1928 से 1941 तक फैली हुई है। उनकी यात्राएं मुख्य रूप से स्वतंत्रता संग्राम, मजदूर आंदोलनों और राजनीतिक सम्मेलनों से जुड़ी थीं। बोस ने यहां कई बार दौरा किया, भाषण दिए और यहां से ही अपना ऐतिहासिक पलायन किया।

झारखंड में उनके स्मारक आज भी उनकी क्रांतिकारी विरासत को जीवित रखते हैं। नीचे नेताजी की प्रमुख यात्राएं का वर्णन है।
जमशेदपुर (1928)

1928 में बोस जमशेदपुर पहुंचे, जहां वे टाटा स्टील के मजदूरों के आंदोलन से जुड़े। उन्होंने टाटा स्टील प्रबंधन से मुलाकात की और मजदूरों के कल्याण के लिए सुधार सुझाए, जैसे बेहतर आवास और वेतन। ये सुझाव बाद में लागू किए गए। बोस यहां टाटा लेबर एसोसिएशन के साथ काम कर चुके थे और मजदूर संघ के पहले अध्यक्ष भी थे।
धनबाद (1930-1941)

1930 से 1941 के बीच बोस ने धनबाद के कई दौरे किए। वे यहां कोयला मजदूरों के आंदोलन से जुड़े और धनबाद कोल माइनर्स यूनियन के संस्थापक थे। स्थानीय निवासियों के अनुसार, बोस ने यहां कई सभाएं कीं और मजदूरों को संगठित किया। 1941 में ही वे गोमो स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर पेशावर गए।

  

प्लेटफॉर्म 1 और 2 के बीच कांस्य प्रतिमा स्थापित है, पट्टिका पर 1941 के पलायन घटना का वर्णन है।
गोमो जंक्शन (17-18 जनवरी 1941)

17 जनवरी 1941 की रात गोमो के लिए यादगार है। वरिष्ठ पत्रकार बिनय शंकर झा बताते हैं- कलकत्ता (तत्कालीन नाम) से भागकर वे अपने भतीजे शिशिर बोस के साथ कार से गोमो पहुंचे। यहां उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह के घर में रुके और पठान के वेश में हावड़ा-पेशावर एक्सप्रेस (तत्कालीन 63 अप ट्रेन) पकड़ी।

यह \“द ग्रेट एस्केप\“ के रूप में जाना जाता है, जिसके बाद वे अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचे। बोस ने गोमो के जंगलों में छिपकर स्वतंत्रता सेनानियों से मुलाकात भी की। यह उनकी भारत में अंतिम ज्ञात उपस्थिति थी। गोमो रेलवे स्टेशन का नाम वर्ष 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन (गोमो) रखा गया।
लोको बाजार स्थित अब्दुल हाता में रुके

नेताजी 17 जनवरी 1941 की रात अपनी पत्नी, भतीजे शिशिर बोस और चाचा अशोक बोस के साथ कार से तोपचांची होते हुए गोमो पहुंचे थे। यहां से वे पेशावर के रास्ते रेंगुनी पहुंचे और फिर गुमनामी के अंधेरे में विलीन हो गए। नेताजी की यह पूरी योजना गोपनीय थी।

नेताजी की गोमो यात्रा की एक कहानी लोको बाजार स्थित अब्दुल्ला हाता से भी जुड़ी है। अधिवक्ता एसएम फकरुल्लाह (64) जो शेख अब्दुल्ला के पोते हैं। वे बताते हैं कि उनके दादा के अनुसार नेताजी पठान वेश में देर शाम अपने भतीजे के साथ उनके घर आए थे। कुछ समय ठहरने के बाद नेताजी ने गोमो स्टेशन जाने की इच्छा जताई और इसे पूरी तरह गोपनीय रखा गया। किरायेदार अमीन दर्जी के साथ उन्हें स्टेशन भेजा गया। जिन्होंने कालका मेल का टिकट कटवाया था।
रामगढ़ (मार्च 1940)

18-20 मार्च 1940 में बोस रामगढ़ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 53वें सत्र में शामिल हुए। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसक नीति का विरोध करते हुए \“एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस\“ का आयोजन किया, जो सुबाष चौक (तत्कालीन राजेंद्र पार्क) में हुआ। यह सम्मेलन फॉरवर्ड ब्लॉक और किसान सभा द्वारा आयोजित था। बोस ने यहां युवाओं को संबोधित किया और उग्र संघर्ष की अपील की। यह घटना स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी।
रांची (1940-1941)

1940 में बोस रांची पहुंचे, जहां वे लालपुर इलाके में फनिंद्रा नाथ अयकट के घर रुके। वे खूंटी होते हुए रांची आए और रामगढ़ सम्मेलन से पहले यहां रुके। 1940-1941 के बीच कई दौरे हुए, जहां बोस ने स्थानीय नेताओं से मुलाकात की।
देवघर (1940)

रामगढ़ सत्र से लौटते हुए बोस देवघर पहुंचे, जहां उन्होंने रामकृष्ण मिशन के ब्रह्मानंद भवन में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित किया। यह भाषण स्वतंत्रता और युवा भागीदारी पर केंद्रित था।
हजारीबाग और गिरिडीह (1940)

रामगढ़ से लौटते हुए बोस ने हजारीबाग और गिरिडीह का दौरा किया, जहां उन्होंने स्थानीय कार्यकर्ताओं से चर्चा की। ये यात्राएं उनके व्यापक नेटवर्क का हिस्सा थीं।

इन यात्राओं ने झारखंड के लोगों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया और बोस की छवि को मजबूत किया।
झारखंड में स्मारक स्थापना और महत्व

झारखंड में बोस की स्मृति में कई स्मारक और प्रतिमाएं हैं, जो ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस पार्क, चकुलिया

पूर्वी सिंहभूम जिले के चकुलिया में स्थित यह पार्क 98 लाख रुपये की लागत से बना। यहां बोस की जीवन-आकार की प्रतिमा है, जो स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देती है। पार्क वार्ड नंबर 10 में एफसीआई गोदाम के पास है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का केंद्र है।
गोमो रेलवे स्टेशन मेमोरियल

2009 में स्टेशन का नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो जंक्शन किया गया। प्लेटफॉर्म 1 और 2 के बीच कांस्य प्रतिमा स्थापित है, जो 1941 के पलायन को याद दिलाती है। एक पट्टिका पर घटना का वर्णन है। हाल ही में, 2025 में नेताजी की 128वीं जयंती पर धनबाद में नई जीवन-आकार प्रतिमा का अनावरण किया गया।
धनबाद के बीच बलिहारी में सुभाष पार्क

धनबाद के कोयलांचल क्षेत्र के बीच बलिहारी एरिया में सुभाष पार्क बना था। 1992-93 में इस पार्क में उनसे जुड़ी यादों को सहेजने का प्रयास किया गया था। अब कोयला खनन और निजी आउटसोर्सिंग एजेंसी की वजह से यह बदहाल है। इसके संरक्षण की जरूरत है।
रामगढ़ सुभाष चौक

1940 के एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस स्थल को सुभाष चौक नाम दिया गया, जो अब सिख रेजिमेंटल सेंटर का हिस्सा है। यहां स्मारक बोस की क्रांतिकारी दृष्टि को सम्मानित करता है।
जमशेदपुर में प्रतिमाएं

  • 2003 में अंबागन मैदान, साकची में बोस की प्रतिमा का अनावरण किया गया, जो टाटा स्टील द्वारा उपलब्ध कराई गई भूमि पर है।
  • 2024 में जमशेदपुर महिला समिति परिसर, बिस्टुपुर में एक और प्रतिमा स्थापित की गई।

देवघर में स्मृतियां

देवघर में रामकृष्ण मिशन का ब्रह्मानंद भवन अनौपचारिक स्मृति स्थल है। 2016 में देवघर में जारी स्पेशल कवर “नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी इन झारखंड“ उनकी यात्राओं को सम्मानित करता है।
विरासत का संरक्षण जरूरी

वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क कहते हैं, झारखंड में बोस की यात्राएं और स्मारक स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इन्हें संरक्षित करने की जरूरत है। 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है और ये स्थल नई पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं।

राज्य सरकार इनको पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित कर सकती है। बोस की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम उनकी स्मृति को जीवित रखते हैं। बीसीसीएल ने कुछ पहल जरूर की है। इसे और बढ़ाने की जरूरत है। कोयलांचल सुभाष बाबू का आना-जाना लगा रहता था।
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