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ट्रंप के बयान पर यूरोप में उबाल, अफगानिस्तान युद्ध पर टिप्पणी के बाद माफी की मांग तेज; नाटो पर उठाए थे सवाल

Chikheang 4 hour(s) ago views 287
  

नाटो की भूमिका कमतर बताने के लिए ट्रंप से माफी की मांग (फोटो- रॉयटर)



रॉयटर, लंदन। अफगानिस्तान में नाटो सैन्य गठबंधन में शामिल यूरोपीय देशों के सैनिकों की भूमिका को कमतर करार देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर यूरोप भड़क उठा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने अपमानजनक और घटिया टिप्पणी के लिए ट्रंप से माफी मांगने का अनुरोध किया है।

ब्रिटेन के प्रिंस हैरी ने कहा है कि अफगानिस्तान में सैनिकों के बलिदान का सम्मान किया जाना चाहिए। जबकि यूरोपीय देशों के पूर्व सैनिकों ने कहा है कि अफगानिस्तान में हमारे सैनिकों के बलिदान का ट्रंप ने अपमान किया है। इसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए। ट्रंप ने कहा था कि अफगानिस्तान में लड़ाई के मोर्चों पर यूरोपीय देशों के सैनिकों ने मामूली भूमिका निभाई थी।

एक अमेरिकी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका को कभी भी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की जरूरत नहीं थी। अफगानिस्तान में ही युद्ध के मोर्चों पर नाटो के सैनिकों ने मामूली भूमिका निभाई।

ट्रंप के इस बयान ने ग्रीनलैंड मसले पर यूरोपीय देशों से संबंधों में पैदा हुए तनाव को और बढ़ा दिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के कार्यालय ने कहा है कि ट्रंप ने दो दशक चले युद्ध में नाटो के सैनिकों की भूमिका को गलत ढंग से कम करके पेश किया है।

ब्रिटिश सरकार में मंत्री एलिस्टेयर का‌र्न्स ने कहा कि सेना के अपने सेवाकाल में वह पांच बार अफगानिस्तान गए, इसलिए ट्रंप का दावा बहुत भद्दा है। हमने अफगानिस्तान में अपना खून, पसीना और आंसू बहाए हैं। जो वहां गए उनमें से सभी वापस नहीं लौटे।

पोलैंड के रिटायर्ड जनरल रोमन पोल्को ने कहा, हमने गठबंधन के लिए अपना खून बहाया है-बलिदान किया है। उसकी उपेक्षा की जा रही है। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप को माफी मांगनी चाहिए।

ऐसे ही बयान अन्य पूर्व सैनिकों ने दिए हैं। 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क और वाशिंगटन पर आतंकी हमलों के बाद नाटो के बैनर तले अमेरिकी सेना के साथ यूरोपीय देशों के सैनिक लड़ने के लिए अफगानिस्तान गए थे।

लगभग 20 वर्ष चले इस युद्ध में 2,460 अमेरिकी सैनिकों ने जान गंवाई जबकि ब्रिटेन के 457 सैनिक मरे थे। इस युद्ध में कनाडा के 150, फ्रांस के 90 सैनिक और डेनमार्क के 44 सैनिक मारे गए थे।
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