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माघी पूर्णिमा पर बन रहा दुर्लभ संयोग, सूर्य-चंद्रमा के साथ पुष्य नक्षत्र की युति देगी अनंत पुण्य

LHC0088 Yesterday 22:56 views 411
  



शैलेश अस्थाना, वाराणसी। माघ मास के स्नान-दान, व्रत और तप के संकल्पों का महापर्व माघी पूर्णिमा इस वर्ष विशेष खगोलीय और ज्योतिषीय संयोगों के कारण अत्यंत फलदायी बन रहा है।

सूर्य और चंद्रमा का योग तथा पुष्य नक्षत्र की युति माघी पूर्णिमा के पुण्य फलों को अक्षय और अनंत बनाने वाली मानी जा रही है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार माघी पूर्णिमा का धार्मिक महत्व सामान्य वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है।
ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी बताते हैं कि माघ मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्दशी तिथि की हानि के कारण इस वर्ष माघी पूर्णिमा एक फरवरी की भोर 5:11 बजे आरंभ होकर दो फरवरी की भोर 3:46 बजे तक रहेगी।

इस अवधि में गंगा सहित सभी पवित्र तीर्थों में स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व रहेगा। बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार, इस वर्ष माघी पूर्णिमा रविवार को पड़ रही है, जिससे सूर्य और चंद्रमा का विशेष योग बन रहा है।

चूंकि पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा हैं और रविवार सूर्य का दिन होता है, इसलिए यह संयोग अनंत पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। इसके साथ ही पुष्य नक्षत्र की उपस्थिति इस पर्व के पुण्य फलों को अक्षय बना रही है। प्रो. पांडेय बताते हैं कि माघी पूर्णिमा को कलियुगादि तिथि भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि से कलियुग का आरंभ हुआ था। माघी पूर्णिमा का नाम माघ मास के कारण नहीं, बल्कि सामान्यतः इस दिन मघा नक्षत्र के योग के कारण पड़ा है।

हालांकि इस वर्ष पूर्णिमा के दिन मघा नक्षत्र न होकर पुष्य नक्षत्र का योग बन रहा है, जबकि मघा नक्षत्र दो दिन बाद लगेगा। माघ मास की पूर्णिमा के दिन प्रयाग संगम सहित अन्य तीर्थों पर कल्पवासियों का एक माह का कल्पवास पूर्ण होता है।

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है। पीले पुष्प, तुलसी दल, दीप और नैवेद्य अर्पित कर विष्णु सहस्रनाम या नारायण मंत्र का जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सूर्य को अर्घ्य देने से आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है।
शुक्रोदय से मांगलिक कार्यों की शुरुआत

पं. ऋषि द्विवेदी बताते हैं कि माघी पूर्णिमा के दिन एक फरवरी की सायं 6:05 बजे अस्त चल रहे शुक्र ग्रह का उदय होगा।

इसके अगले दिन से विवाह, गौना, मुंडन सहित सभी मांगलिक कार्यों के शुभ लग्न आरंभ हो जाएंगे। इसी दिन संत शिरोमणि रविदास की जयंती भी मनाई जाएगी, जिसके चलते काशी के सीर गोवर्धन में उनके अनुयायियों की भारी भीड़ उमड़ेगी।
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