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कर्तव्य पथ पर सजी भारत की संस्कृति, अलग-अलग राज्यों की झांकियों ने मोह लिया मन (Image Source: ANI)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हर साल की तरह, इस बार भी जब कर्तव्य पथ पर अलग-अलग राज्यों की झांकियां निकलीं, तो ऐसा लगा मानो पूरा हिंदुस्तान एक ही जगह सिमट आया हो। नजारा ऐसा था कि हर किसी की सांसें थम गईं- कहीं राजस्थान की झांकी में 24 कैरेट सोने की शाही चमक थी, तो कहीं हिमाचल की झांकी में बर्फ से ढके पहाड़ और परमवीर चक्र विजेताओं की गूंजती वीरगाथा।
जी हां, असम की मिट्टी की कला से लेकर पंजाब के बलिदान और गुजरात के स्वावलंबन तक, हर झांकी एक नई और गर्व से भरी कहानी कह रही थी ()। आइए, एक नजर डालते हैं भारत की इस गौरवशाली विरासत के सफर पर और जानते हैं कि इस गणतंत्र दिवस किस राज्य ने कैसे पेश की अपनी अनोखी पहचान।
राजस्थान की झांकी
(Image Source: ANI)
राजस्थान की झांकी ने कर्तव्य पथ पर एक \“शाही\“ माहौल बना दिया। इस बार \“मरुधरा\“ ने बीकानेर की मशहूर \“उस्ता कला\“ को दुनिया के सामने रखा। झांकी की मेहराबों और कुप्पियों को 24 कैरेट सोने के वर्क और प्राकृतिक रंगों से इतनी खूबसूरती से सजाया गया था कि नजरें हटाना मुश्किल था। इसके साथ ही, पारंपरिक \“गेर नृत्य\“ करते कलाकारों ने राजस्थान की जीवंत संस्कृति और शिल्प कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन किया।
हिमाचल प्रदेश की झांकी
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हिमाचल प्रदेश ने इस बार दुनिया को बताया कि वह केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि \“वीर भूमि\“ भी है। झांकी में काठकुणी वास्तुकला के साथ-साथ राज्य के चार परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमाएं शिखर पर नजर आईं। मेजर सोमनाथ शर्मा से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक, देश के लिए जान न्योछावर करने वाले 1,203 वीरों को श्रद्धांजलि दी गई। बर्फ की पहाड़ियों के बीच तिरंगा फहराते सैनिकों के दृश्य ने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।
पंजाब की झांकी
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पंजाब की झांकी \“हिंद दी चादर\“ कहे जाने वाले गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी पर्व को समर्पित रही। झांकी में दिल्ली के ऐतिहासिक गुरुद्वारा सीस गंज साहिब की हूबहू प्रतिकृति दिखाई गई। \“एक ओंकार\“ के स्वरूप और रागी सिंहों द्वारा किए जा रहे \“शब्द कीर्तन\“ ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। इसके साथ ही, भाई मति दास और भाई सती दास जैसे गुरु साहिब के साथियों के बलिदान को भी दर्शाया गया, जो धर्म और मानवीय गरिमा की रक्षा का संदेश दे रहे थे।
उत्तर प्रदेश की झांकी
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उत्तर प्रदेश की झांकी में बुंदेलखंड की विरासत और राज्य की आधुनिक रफ्तार दोनों एक साथ दिखीं। झांकी के अगले हिस्से में कालिंजर किले का \“एकमुख शिवलिंग\“ आकर्षण का केंद्र रहा। वहीं, बीच के हिस्से में \“एक जनपद एक उत्पाद\“ के तहत बुंदेलखंड के मिट्टी के बर्तनों और शिल्प को दिखाया गया। झांकी का पिछला हिस्सा एकदम अलग था, जिसमें एक्सप्रेस-वे और उद्योगों के जरिए यूपी की आधुनिक तरक्की को दर्शाया गया।
छत्तीसगढ़ की झांकी
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छत्तीसगढ़ ने अपनी झांकी के जरिए आदिवासी नायकों के संघर्ष को याद किया। इसमें 1910 के विद्रोह के महानायक वीर गुंडाधुर और 1857 की क्रांति के शहीद वीर नारायण सिंह की प्रतिमाएं प्रमुखता से दिखाई गईं। खास बात यह रही कि झांकी में नवा रायपुर के उस \“डिजिटल म्यूजियम\“ को भी प्रदर्शित किया गया, जो आधुनिक तकनीक के जरिए आदिवासी विद्रोहों की गाथाओं को संरक्षित कर रहा है।
असम की झांकी
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असम की झांकी ने धुबरी जिले की प्रसिद्ध टेराकोटा (मिट्टी शिल्प) कला का जादू बिखेरा। झांकी को एक विशाल और सुंदर \“मयूरपंखी नाव\“ का आकार दिया गया था। इसमें \“हीरामति\“ मिट्टी से मूर्तियां बनाते कलाकार और मेखला चादर पहने लोक गीतों पर थिरकती महिलाएं असम की आत्मनिर्भरता और कलात्मक पहचान का जश्न मना रही थीं।
गुजरात की झांकी
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गुजरात की झांकी ने \“वंदे मातरम\“ के 150 साल पूरे होने और मैडम भीखाजी कामा के योगदान को सलाम किया। झांकी में दिखाया गया कि कैसे 1907 में भीखाजी कामा ने विदेशी धरती (पेरिस) पर भारत का झंडा बुलंद किया था। झांकी के पिछले हिस्से में महात्मा गांधी और चरखे के जरिए \“आत्मनिर्भर भारत\“ का संदेश दिया गया, जबकि \“कसुंबी नो रंग\“ गीत पर थिरकते कलाकारों ने देशभक्ति का रंग जमा दिया।
इस साल की झांकियों ने न सिर्फ भारत की विविधता को दिखाया, बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज वीरता और भविष्य की आधुनिकता को भी एक धागे में पिरो दिया। हर राज्य की अपनी कहानी थी, लेकिन संदेश एक ही था- \“एक भारत, श्रेष्ठ भारत\“।
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