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डोनाल्‍ड ट्रंप के राज में 〷दी मैजिक✩ेअसर, अब भारत को विदेश नीति बदलने की जरूरत है? जानें क्‍यों कह रहे विशेषज्ञ

deltin55 1 hour(s) ago views 2


वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में इस साल सरकार बदलने के बाद से अचानकर भारत को विदेश नीति के मोर्चे पर कई झटके लगे हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत को उम्मीदों के मुताबिक वैश्विक नेताओं का साथ नहीं मिला। इस हफ्ते वाइट हाउस में पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का लंच कार्यक्रम सरकार के लिए और ज्यादा असहज करने वाला रहा है। ये बहुत बड़ा डिप्लोमेटिक झटका है। ऐसा महसूस हो रहा है कि भारत की विदेश नीति जो पिछले 10 सालों में बेहद कामयाब दिख रही थी उसके आगे अचानक एक स्पीड ब्रेकर आ गया है। भारत अपनी विदेश नीति की गाड़ी को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है और इस हफ्ते जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान कनाडा के साथ फिर से संबंधों को बहाल करने की कोशिश उसी का एक संकेत है।दोनों देशों ने उच्चायुक्तों को फिर से बहाल करने और अपने वाणिज्य दूतावासों में नागरिकों और व्यवसायों के लिए नियमित सेवाएं बहाल करने का फैसला किया है। बैठक के बाद मोदी ने यह भी कहा कि व्यापार, स्वच्छ ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं। कनाडाई मीडिया के हरदीप सिंह निज्जर पर पूछे गये सवाल को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने टाल दिया, ये एक अच्छी बात थी। G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच भी मुलाकात होने का कार्यक्रम था, लेकिन इजरायल-ईरान युद्ध की वजह से ट्रंप अचानक वॉशिंगटन लौट गये, जिसके बाद दोनों नेताओं ने करीब 35 मिनट तक टेलीफोन पर बात की। इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने साफ किया कि भारत, कश्मीर मुद्दे पर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा। डोनाल्ड ट्रंप अभी तक भारत-पाकिस्तान संघर्ष विराम में अपनी भूमिका होने की बात करीब 15 बार कर चुके हैं।विदेश नीति में 10 सालों तक कामयाब रहा मोदी मैजिकवीणा वेणुगोपालन ने फाइनेंशियल टाइम्स (FT) की एक रिपोर्ट में लिखा है कि इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 10 सालों में भारत की विदेश नीति को एक नई ऊंचाई मिली है। मोदी ने व्यक्तिगत कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए 100 से ज्यादा देशों का दौरा किया और प्रवासी भारतीयों को भारत से जोड़ते हुए उसे वैश्विक शक्ति के रूप में जोड़ा। मोदी ने अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया जैसे शक्तिशाली देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को काफी मजबूत किया है। "मोदी मैजिक" ने भारत की छवि को काफी मजबूत किया। चाहे QUAD हो, G20 की अध्यक्षता हो या BRICS में संतुलन बैठाना, भारत एक कुशल डिप्लोमेटिक मैनेजर बनकर उभरा। लेकिन अब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह कूटनीतिक शैली भारत की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को पर्याप्त रूप से सुरक्षित कर पा रही है?बुधवार को डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर को लंच के लिए आमंत्रित किया और घोषणा की कि वह पाकिस्तान से प्यार करते हैं। यह उनके पहले कार्यकाल के दौरान अपनाई गई नीति से यू-टर्न है। पिछले शासनकाल में उन्होंने पाकिस्तान को 』ंकवादियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह✩हा था। उन्होंने पाकिस्तान पर "धोखेबाज" होने का आरोप लगाया था। अब वो पलट गये हैं। ट्रंप की वापसी के वक्त परेशान पाकिस्तान अब खुश है। FT के मुताबिक कश्मीर मुद्दे पर भारत की विदेश नीति इस बात पर आधारित रही है कि पाकिस्तान को वैश्विक नेताओं के बीच भारत के समान वैधता नहीं दी जाए, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की ぁकी✩ीति के सामने अब यह काफी मुश्किल लग रहा है। ट्रंप बार बार कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कर रहे हैं और असीम मुनीर उन्हें नोबल पुरस्कार का उम्मीदवार बता रहे हैं। निश्चित तौर पर भारत के लिए ये बातें परेशान करने वाली हैं।ट्रंप पर भरोसा कर मोदी ने बड़ी गलती कर दी?फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के साथ अपने गर्मजोशी भरे व्यक्तिगत संबंधों पर भरोसा करने की गलती की है। मोदी के व्यक्तिगत संबंध बनाने की कूटनीतिक रणनीति, जिस पर भारत पिछले एक दशक से अमेरिकी राष्ट्रपति और अन्य नेताओं के साथ निर्भर रहा है, उसपर अब सवाल हैं। दुनिया आज कई संघर्षों में उलझा हुआ है और वैश्विक अराजकता की स्थिति ही नई वास्तविकता है, जिसमें निजी संबंध या व्यक्तिगत मित्रता बहुत मायने नहीं रखती हैं। भारत को अपनी नेशनल सिक्योरिटी और आर्थिक विकास, दोनों वजहों से अपने क्षेत्र और पश्चिम में मित्रों और समर्थकों की तत्काल आवश्यकता है। पहलगाम आतंकी हमले से पहले चीन के साथ सीमा पार झड़पें मुश्किल से खत्म हो पाई थीं।लेकिन अब शायद प्रधानमंत्री मोदी को भी यह एहसास हो रहा है कि रिश्ते लेन-देन के होते हैं और किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भारत की कारोबार में मल्टी-पोलर स्ट्रैटजी की ओर बदलाव, व्यापार जैसे कुछ क्षेत्रों में काफी कारगर रहा है, लेकिन भारत कई अन्य क्षेत्रों में सार्थक साझेदारी बनाने में नाकाम भी रहा है। यानि भारत को अब समझना होगा कि बदलते जियो-पॉलिटिकल हालातों में दशकों पुराने नियम अब काम नहीं कर रहे हैं। गहराई से देखने पर पता चलता है कि हाल ही में इजरायल-गाजा युद्ध और ईरान के साथ टकराव में अमेरिका के स्पष्ट झुकाव के बाद भारत पर भी एक पक्ष चुनने का दबाव बढ़ रहा है। वहीं, अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की भूमिका सिर्फ एक 〷र्चे के सहयोगी✩क सीमित लगती है। भारत को चाहिए कि वह QUAD, BRICS, SCO और I2U2 जैसे समूहों में अपनी शर्तों पर भूमिका तय करे। खासकर QUAD को अब भारत को नये नजरिए ये देखने की जरूरत है और हर हाल में अमेरिकी एजेंडा से अलग चलना होगा, भले ही परिणाम और मुश्किल क्यों ना हो, मगर दीर्घकालिक रणनीति के लिए वही फायदेमंद होंगे।〪प्लोमेट मोदी✩िछले 10 सालों में भारत की विदेश नीति का सबसे मजबूत ब्रांड रहा है, लेकिन हर ब्रांड की एक सीमा होती है और अब भारत को भावनात्मक कूटनीति, व्यक्तिगत बॉन्डिंग जैसी नीतियों से आगे बढ़ते हुए एक अलग विदेश नीति को अपनाना होगा, जिसमें सिर्फ चुनौतियों के सामने आने पर प्रतिक्रिया देने की स्थिति ना बने। भारत को अब प्रतिक्रिया देना होगा और सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देना होगा, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने की स्थिति में आना होगा। भारत की नई विदेश नीति में ग्लोबल इमेज बनाने पर नहीं, बल्कि ग्लोबल इन्फ्लुएंस पर आधारित होना चाहिए। भारत को あ अच्छे हैं✩ी नीति से भी बाहर आना होगा और अमेरिका, चीन, रूस या पश्चिमी देश, जिस तरह मुद्दों के आधार पर पलटी मारते हैं, उसको लेकर सतर्क रहते हुए अपनी स्ट्रैटजी बनानी होगी, जिसमें ぁटैंड लेना✩बसे महत्वपूर्ण है।
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