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विचार: मोदी के चहेते अर्थशास्त्री की नसीहत, 2025 सुधारों का साल नहीं था, अब 2026 की परीक्षा; पनगढ़िया की सराहना के पीछे का सच

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यह कोई रहस्य नहीं है कि प्रोफेसर अरविंद पनगढ़िया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा अर्थशास्त्री हैं। वे दिल्ली में उनके मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक रहे हैं। वे नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष (जनवरी 2015 से अगस्त 2017) रहे। उन्होंने भारत के जी-20 शेरपा (2015-2017) के रूप में कार्य किया। उन्हें अप्रैल, 2023 में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और दिसंबर 2023 में 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। वे सरकार की ओर से गठित कई कार्यबलों के प्रमुख रहे। राजग सरकार में उनका लंबा कार्यकाल उल्लेखनीय है।




डॉ. पनगढ़िया कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और वे अपने गुरु डॉ. जगदीश भगवती के पदचिह्नों पर चलने वाले मुक्त व्यापार के समर्थक हैं। मैं खुली अर्थव्यवस्था और मुक्त व्यापार के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के लिए उनकी सराहना करता हूं। चूंकि वे प्रधानमंत्रीके वफादार समर्थक हैं, इसलिए उनकी आलोचनाएं अक्सर ‘शाबाश, दिल मांगे मोर’ के आवरण में छिपी रहती हैं।







हाल ही में एक लेख में अरविंद पनगढ़िया ने सरकार की सराहना करते हुए कहा, ‘वर्ष 2025 को भारत के आर्थिक सुधारों के वर्ष के रूप में इतिहास में दर्ज किया जाएगा।’ वे जानते हैं कि यह सच नहीं है। वर्ष 2025 में नाममात्र के सुधार हुए। मीडिया और संसदीय कार्यवाही के अवलोकन से पता चलता है कि 2025 में ‘आर्थिक सुधारों’ के नाम पर कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं किया गया। उदाहरण के लिए:







उच्चारण में कठिन वीबी जी-राम-जी अधिनियम कोई सुधार नहीं था, बल्कि इसने दुनिया के सबसे बड़े काम-सह-कल्याण कार्यक्रम को नष्ट कर दिया, जिस पर ग्रामीण गरीब परिवारों के 8.6 करोड़ जाब कार्ड धारकों की आजीविका टिकी हुई थी।




सम्मानपूर्वक कहना चाहूंगा कि वर्ष 2025 में ऐसा कोई कदम नहीं दिखता, जिसे वास्तव में महत्त्वपूर्ण आर्थिक सुधार कहा जा सके।



दरअसल, सरकार पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए डा पनगढ़िया ने छह ऐसे उपाय सुझाए हैं, जो सरकार को वर्ष 2026 में करने चाहिए। यह एजंडा पिछले ग्यारह वर्षों में सरकार के सुधार-विरोधी रुख पर सवाल खड़े करता है। यह सिक्के को चतुराई से पलटने जैसा है। ‘हेड्स’ कहकर डॉ. पनगढ़िया ने स्वीकार किया है कि अब तक फैसला ‘टेल्स’ ही था।







आइए, छह सिफारिशों पर नजर डालें:
सीमा शुल्क में कमी करें : अध्याय-वार एकसमान सीमा शुल्क और शुल्क में कमी की पहल यूपीए सरकार ने की थी, जिसके तहत सभी वस्तुओं पर व्यापार-भारित औसत सीमा शुल्क को घटाकर 6.34 फीसद कर दिया गया था। राजग सरकार के कार्यकाल में इसमें उलटफेर हुआ और व्यापार-भारित औसत सीमा शुल्क बढ़कर लगभग 12 फीसद हो गया। ज्यादातर मुख्यमंत्रियों की तरह नरेंद्र मोदी गुजरात में स्वाभाविक रूप से संरक्षणवादी थे और वे उसी मानसिकता को केंद्र सरकार में भी ले आए, जहां संरक्षणवादी गुटों ने उनका जमकर समर्थन और प्रोत्साहन किया। आत्मनिर्भरता वास्तव में उस आत्मनिर्भरता और संरक्षणवाद का नया नाम था, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग तीन दशकों तक बंद रखा था। डा पनगढ़िया ने सिफारिश की है कि सरकार को आयात पर एकसमान सात फीसद की दर लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए।




गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) की वापसी : गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों की शृंखला किसने लागू की? क्यूसीओ वास्तव में आयात पर गैर-शुल्क बाधाएं हैं। यदि भारतीय उत्पादों पर भी यही गुणवत्ता मानक लागू किए जाएं, तो कुछ ही उत्पाद कसौटी पर खरे उतरेंगे। डॉ. पनगढ़िया ने वर्ष 2025 में 22 क्यूसीओ वापस लेने के लिए सरकार की सराहना की, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इन क्यूसीओ की घोषणा पहली बार कब की गई थी।



इन्हीं 22 क्यूसीओ को अधिसूचित करने का वर्षवार ब्योरा इस प्रकार है:







बाकी की स्थिति और भी बुरी है। 22 क्यूसीओ वापस लेने के बाद अनुमान है कि अभी भी लगभग 700 से अधिक क्यूसीओ लागू हैं!




व्यापार समझौतों पर ध्यान दें : डा पनगढ़िया ने ‘आयात उदारीकरण के प्रति हमारे सहज प्रतिरोध’ को स्वीकार किया। ‘हमारा’ कौन है? कोई और नहीं, बल्कि राजग सरकार। इसने दो दशकों के आयात उदारीकरण को उलट दिया, विदेश व्यापार नीति को कठोर बनाया, वर्ष 2018 में सीपीटीपीपी पर हस्ताक्षर करने के निमंत्रण को ठुकरा दिया तथा 2019 में आरसीईपी से हट गई, और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के प्रति अरुचि व्यक्त की।



डीजीटीआर पर लगाम कसें : विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बहुत कम (2.8 फीसद) होने के बावजूद, सरकार ने उत्पादों पर लगभग 250 एंटी-डंपिंग शुल्क लगाए हैं। सीमा शुल्क, प्रतिकारी और सुरक्षा शुल्क को मिलाकर, भारत में उच्च शुल्क बाधाएं हैं। डीजीटीआर को संरक्षणवादी व्यवस्था को लागू करने का निर्देश दिया गया था और अन्य सभी नौकरशाही प्राधिकरणों की तरह इसने भी अपनी इस भूमिका का भरपूर आनंद लिया। डीजीटीआर के दायित्व को फिर से परिभाषित किया जाना चाहिए।




रुपए का अत्यधिक मूल्यांकन न करें : विनिमय दर एक संवेदनशील मुद्दा है। यह विदेशी मुद्रा प्रवाह, आपूर्ति एवं मांग, महंगाई और राजकोषीय घाटा आदि से प्रभावित होती है। रुपए का अत्यधिक मूल्यांकन निर्यात को प्रभावित करेगा, जबकि रुपए के अवमूल्यन के दूसरे प्रभाव होते हैं। रुपए का मूल्य बाजार और आरबीआइ पर छोड़ देना ही बेहतर है, और हस्तक्षेप केवल अत्यधिक अस्थिरता के समय ही किया जाना चाहिए।




निर्यात पर नजर रखें : बहुत सारे नीतिगत बदलाव, नियम, विनियम, निर्देश, प्रपत्र, अनुपालन आदि ने निर्यात में बाधा डाली है। इसका जवाब हर साल के अंत में नियमों की होली जलाना है।


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