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Holi 2026: ब्रज की माटी में चढ़ने लगा होली का रंग, घुटने लगी भांग की ठंडाई; छा रहा उल्लास

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Holi 2026: मथुरा में चौपाल पर ठंडाई तैयार करते लाेग।  



जागरण संवाददाता, मथुरा। ब्रज की माटी में होली का रंग चढ़ने लगा है। 15 फरवरी को होने वाली महाशिवरात्रि के साथ ही यहां होली का उत्साह अब सातवें आसमान पर पहुंचने को बेताब है।

कान्हा की नगरी में मान्यता है कि बिना भांग के होली का आनंद अधूरा है, और इसी आनंद की तैयारी अब यमुना घाटों से लेकर अखाड़ों तक साफ दिखाई दे रही है।इन दिनों यमुना घाटों और अखाड़ों पर सिल-बट्टे से भांग घुट रही है।

भांग के शौकीन इसे केवल एक नशा नहीं, बल्कि ब्रज की परंपरा और प्रसाद मानते हैं। सिल-बट्टे पर बादाम, काली मिर्च, इलायची के साथ जब भांग घुटती है तो उसकी महक दूर तक मदहोश कर देती है।

ब्रज में परंपरा रही है कि शिवरात्रि के बाद से ही होली की रंगत शबाब पर आ जाती है। जगह-जगह चौपालों पर रसिया गान और ठंडाई के दौर शुरू हो जाते हैं।

भांग घोटने वाले शौकीनों का मानना है कि महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ को भोग लगाने के बाद, ब्रज का कोना-कोना होली के खुमार में डूब जाएगा। होली आने से पहले सिल-बट्टे पर भांग की घुटाई तेज हाेने लगी है।

महाशिवरात्रि के बाद तो होली का उल्लास भी सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। भांग के शौकीन अपने को नशेड़ी नहीं , बल्कि मदमस्तों की टोली मानते हैं। भंग को छानने से पहले भगवान बलराम को भोग लगाते हैं।

धार्मिक मान्यता है, चतुर्वेदी समाज के लोगों ने कंस वध के बाद विश्राम घाट पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का स्वागत भांग से ही किया था।

कंस टीला पर सनातन देव, सतीश, महेंद्र, नंदलाल, चंदूलाल, किट्टू अशोक सेठ, डब्बू, विष्णु भांग घोटने में मस्त थे। भांग की ठंडाई तैयार करने में करीब डेढ़ दो घंटे का समय लग जाता है।

छान-छान किसी की मत मान, जब निकल जाएगी जान, तो कौन कहेगा छान जैसे फाग पर मदमस्त हो रहे थे। डब्बू बताते हैं कि भांग के बिना तो होली की मस्ती अधूरी है।
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