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SC की टिप्पणी से आहत जस्टिस पंकज भाटिया, हाई कोर्ट से किया अनुरोध- सुनवाई के लिए न दी जाएं जमानत याचिकाएं

cy520520 2 hour(s) ago views 753
  



विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस पंकज भाटिया सुप्रीम कोर्ट की एक कठोर टिप्पणी से आहत हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पड़ियां उन्हें हतोत्साहित करने वाली एवं उन पर दुष्प्रभाव डालने वाली हैं। यह कहते हुए शुक्रवार को जमानत याचिकाओं को सुनने से इनकार कर दिया।  

जस्टिस पंकज भाटिया ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया है कि भविष्य में उन्हें जमानत याचिकाएं सुनने को न दी जाएं। उन्होंने यह बात अभियुक्त राकेश तिवारी की दूसरी जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कही।

जैसे ही उनके सामने यह मामला सुनवाई के लिए आया तो उन्होंने गत 9 फरवरी 2026 केा सुप्रीम कोर्ट द्वारा चेतराम वर्मा के मामले में उनके खिलाफ की गई गंभीर टिप्पड़ियों का संज्ञान ले लिया।

उन्होंने कहा कि उनके द्वारा एक अन्य मामले में दिए गए जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई थी, जिसने उनके आदेश को निरस्त कर दिया जो कि सामान्य बात है, क्योंकि कोई भी न्यायाधीश यह दावा नहीं कर सकता कि उसके किसी आदेश को ऊपरी अदालत द्वारा कभी खारिज न किया गया हो या उसमें हस्तक्षेप न किया गया हो, परंतु उक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गई टिप्पणियां उनका मनोबल गिराने वाली तथा डराने वाली है।

दहेज हत्या मामले में दी थी जमानत

दरअसल, जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने दहेज हत्या के एक मामले में 10 अक्टूबर 2025 को अभियुक्त पति को जमानत दी थी। इस मामले में महिला की मृत्यु गला घोंटने से हुई थी। हाई कोर्ट के आदेश से पीड़िता वादी चेतराम वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत आदेश को चुनौती दी थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि जस्टिस भाटिया के आदेष का कारण केवल यह बताया गया था कि अभियुक्त पति 27 जुलाई 2025 से जेल में था और उसका केाई आपराधिक इतिहास नहीं था।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उक्त जमानत आदेश को खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि उक्त आदेश उन सबसे निराशाजनक आदेशों में से है जो हमने पिछले कुछ समय में देखे हैं।  

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि उक्त आदेश द्वारा आखिर हाईकोर्ट कहना क्या चाहता है? उसने कहां अपने विवेक का इस्तेमाल किया है और सिर्फ बचाव पक्ष की दलीलों और अभियुक्त की जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर जमानत दे दी है। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जमानत आदेश को खारिज कर दिया था।
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