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लालटेन की लौ में अपनों की बगावत: अनुशासन का हंटर चला, सिंटू बाहर, मंजू और रमेश को अल्टीमेटम

Chikheang 1 hour(s) ago views 349
  

फाइल फोटो।


जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। शहर में नगर निकाय और नगर परिषद चुनावों का बिगुल बजते ही राजनीतिक दलों के भीतर मची खींचतान अब सड़कों पर आ गई है। महागठबंधन के महत्वपूर्ण घटक दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में इन दिनों नूराकुश्ती का खेल चल रहा है।    चुनावी रणभेरी के बीच पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी जेबा खान के समर्थन में एकजुट होने के बजाय, दिग्गज नेता अपनी ही ढपली और अपना ही राग अलाप रहे हैं। इस बेसुरी तान को रोकने के लिए राजद जिला अध्यक्ष शंभू चौधरी ने कड़ा रुख अपनाते हुए अनुशासन का हंटर चलाया है।  
सिंटू पांडेय पर गिरी गाज, पार्टी से हुए निलंबित चुनावी अखाड़े में पार्टी विरोधी सुर बुलंद करना बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष सिंटू पांडेय को भारी पड़ गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने आधिकारिक निर्णयों को दरकिनार कर सार्वजनिक मंचों पर अनुशासन की मर्यादा लांघी और जेबा खान के खिलाफ बयानबाजी की।    जिला अध्यक्ष शंभू चौधरी ने इसे गंभीरता से लेते हुए सिंटू पांडेय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उन्हें तीन दिनों की मोहलत दी गई है कि वे स्पष्ट करें कि क्यों न उनकी प्राथमिक सदस्यता स्थायी रूप से समाप्त कर दी जाए।  
मंजू शाह का नामांकन कांड बगावत की इस पटकथा में मंजू शाह की भूमिका ने भी सबको चौंका दिया है। सूत्रों के अनुसार, मंजू ने मानगो नगर निगम अध्यक्ष पद के लिए टिकट की मांग की थी, लेकिन नामांकन के ऐन वक्त पर वे गुमशुदा हो गईं।    बिना जानकारी दिए नामांकन से दूरी बनाना और फिर पार्टी प्रत्याशी के विरोध में मोर्चा खोलना उनके लिए गले की फांस बन गया है। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।



वहीं, महानगर अध्यक्ष रमेश राय के शब्दों ने विवाद की आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने जिला अध्यक्ष शंभू चौधरी को देहाती जिला अध्यक्ष कहकर संबोधित किया, जो अब उनके राजनीतिक करियर के लिए हॉट सीट बन गया है।  
जनता के मुद्दे हाशिए पर, गुटबाजी चरम पर विडंबना यह है कि जहां एक ओर जमशेदपुर की जनता सड़कों के गड्ढों, कचरे और पानी की किल्लत से त्रस्त है, वहीं राजनीतिक दलों के भीतर तू-तू मैं-मैं का हाई-वोल्टेज ड्रामा जारी है। राजद ही नहीं, पिछले दिनों भाजपा में भी राजकुमार श्रीवास्तव के इस्तीफे के बाद ऐसा ही मंजर देखने को मिला था।



जमशेदपुर की गलियों में अब चर्चा है कि विकास के वादे और चुनावी एजेंडे कहीं पीछे छूट गए हैं। फिलहाल तो राजनीतिक दल अपने ही कुनबे को बिखरने से बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं।   अब सभी की निगाहें तीन दिनों बाद आने वाले जवाबों पर टिकी हैं। क्या बगावत शांत होगी या लालटेन की यह लौ अपनों की ही आंधी में धुंधली पड़ जाएगी?
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