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इंसान नहीं, बल्कि फल से होती है यहां बेटियों की पहली शादी, दिलचस्प है इस रस्म के पीछे का रहस्य

deltin33 8 hour(s) ago views 303
  

ऐसी प्राचीन परंपरा जहां सौभाग्य के लिए फल को चुना जाता है जीवनसाथी (Image Source: Instagram)



लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सुना है कि किसी लड़की की शादी एक फल से कराई जाए? पढ़ने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों में यह एक बहुत पुरानी और मानी-जानी परंपरा है। नेपाल के नेवा समुदाय के अलावा, भारत के बिहार, झारखंड और बंगाल में भी इस अनोखी रस्म को देखा जा सकता है, जहां लड़कियों को विवाह की एक विशेष परंपरा से गुजरना पड़ता है।

  

(Image Source: Instagram)
आखिर क्यों की जाती है फल से शादी?

इस परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं छिपी हैं। दरअसल, बेल फल भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि बेल फल से विवाह कराने पर कन्या को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह एक प्रकार का प्रतीकात्मक विवाह है। मान्यता है कि ऐसा करने से लड़की के भविष्य के वैवाहिक जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। कई समुदायों में यह रस्म कुंडली के दोष, मंगल दोष या किसी भी तरह के अशुभ योग को शांत करने के लिए भी निभाई जाती है।

  

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सूर्य देव से विवाह और रस्म का समय

सिर्फ बेल विवाह ही नहीं, इसके बाद एक और रस्म होती है जिसे \“बाहरा संस्कार\“ कहा जाता है। इसमें लड़कियों का विवाह सूर्य देव के साथ कराया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी अनुष्ठान लड़की के यौवन में प्रवेश करने से पहले या उसके पहले मासिक धर्म से पूर्व ही संपन्न कर लिए जाते हैं।
कैसे होती है यह अनोखी शादी?

इस विवाह की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प होती है। इसमें कन्या का विधिवत पूजन किया जाता है और बेल फल को दूल्हे के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता है। मंत्रोच्चार और रस्मों के साथ विवाह संपन्न कराया जाता है। रस्म पूरी होने के बाद, उस बेल फल को पवित्र मानकर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है या शिवलिंग पर अर्पित कर दिया जाता है।

  

(Image Source: Instagram)
परंपरा और विश्वास पर आधारित

यह समझना जरूरी है कि यह केवल एक धार्मिक और सांकेतिक संस्कार है, कोई कानूनी या सामाजिक विवाह नहीं। इस रस्म के बाद लड़की का सामान्य विवाह किसी पुरुष से ही किया जाता है। वर्तमान समय में, यह पूरी तरह परिवार की मान्यताओं पर निर्भर करता है। जहां कई लोग इसे अपनी परंपरा और आस्था का अटूट हिस्सा मानते हैं, वहीं कुछ लोग अब इसे नहीं अपनाते हैं।

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