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उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम: मदरसों के छात्रों को मिलेगी मुख्यधारा की शिक्षा

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उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी।



अशोक केडियाल, देहरादून। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है, जिसने न केवल मुस्लिम बल्कि सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई व पारसी अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को संरक्षित करने की चिंता की है।

धामी सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू किया है। इसके अंतर्गत गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के दायरे में मुस्लिम समेत सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को लाया गया है।

सबको शिक्षा की अवधारणा को मूर्त रूप देते हुए अल्पसंख्यक समुदायों की भावी पीढ़ी के लिए गुणवत्तायुक्त शिक्षा की दिशा में यह क्रांतिकारी कदम है।

अब तक मदरसों में सीमित धार्मिक तालीम लेने वाले बच्चे मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धी शिक्षा से दूर रह जाते थे, लेकिन नई व्यवस्था से उनके लिए नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे। वे भी डाक्टर, इंजीनियर बन सकेंगे।

उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने सोमवार को दैनिक जागरण की ओर से उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन के दूरगामी परिणाम विषय पर आयोजित विमर्श में उक्त बातें कहीं।

उन्होंने उत्तराखंड अल्पसंख्यक अधिनियम और इसके तहत गठित प्राधिकरण के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार को अहम कदम उठाए हैं और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण इसी कड़ी का हिस्सा है। अब सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों के एक छतरी के नीचे आने से वहां आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

इन संस्थानों, विशेषकर मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को भी अब प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अवसर मिल सकेंगे। वे भी प्रशासनिक सेवाओं जैसे आइएएस, आइपीएस एवं तकनीकी सेवाओं में भी भागीदारी कर सकेंगे।

कासमी ने कहा कि सबसे अहम बात यह है कि प्राधिकरण के दायरे में आने वाले संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर कोई रोक टोक नहीं है। उन्होंने कहा कि प्राधिकरण का गठन अल्पसंख्यक समुदायों के लिए एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी पहल है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास के मंत्र को धामी सरकार ने उत्तराखंड में धरातल पर उतारने का कार्य प्रभावी ढंग से किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी), सख्त नकलरोधी कानून और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन जैसे फैसलों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और समानता को बढ़ावा दिया है।
अतीत में अल्पसंख्यक समाज को रखा गया वंचित

कासमी ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि अतीत में अल्पसंख्यक समाज को मुख्यधारा से जोडऩे के बजाय उन्हें सीमित दायरे में रखा गया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा के आधुनिकीकरण की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए, जिसके कारण युवाओं का समग्र विकास बाधित हुआ। अब वर्तमान सरकार ने इस स्थिति को बदलने की पहल की है, जिसका सकारात्मक असर आने वाले समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।
मदरसों का भविष्य अब बदलेगा

कासमी ने कहा कि पारंपरिक मदरसा शिक्षा की सीमाओं को समझते हुए उसमें बदलाव लाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक शिक्षा के आधार पर युवाओं के लिए करियर बनाना कठिन हो जाता है, इसलिए अब मदरसों में आधुनिक विषयों को शामिल किया जा रहा है।

उन्होंने विशेष रूप से संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर देते हुए कहा कि इससे छात्रों का बौद्धिक विकास होगा और वे भारतीय ज्ञान परंपरा से भी जुड़ सकेंगे। नई शिक्षा व्यवस्था से मदरसों के छात्रों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
मोदी सरकार की योजनाओं का मिल रहा लाभ

कासमी ने कहा कि केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ अब अल्पसंख्यक समाज के लोगों तक तेजी से पहुंच रहा है। मुद्रा लोन, आयुष्मान भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं ने युवाओं को स्वरोजगार और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की है।

उन्होंने बताया कि जब वह समाज के बीच जाते हैं तो अधिकांश लोग इन योजनाओं की सराहना करते हैं और इन्हें अपने जीवन में उपयोगी मानते हैं।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग निजी स्वार्थ के चलते भ्रम फैलाने का प्रयास करते हैं, लेकिन जागरूकता बढऩे से अब ऐसे प्रयास सफल नहीं हो पा रहे हैं।
अवैध कब्जों पर कार्रवाई जरूरी

कासमी ने कहा कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर धार्मिक स्थलों का निर्माण करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की ओर से ऐसे मामलों में की गई कार्रवाई कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है।

उन्होंने सभी धर्मों के मूल संदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि ईमानदारी और नियमों का पालन ही सच्चा धर्म है।

इसलिए समाज को भी ऐसे मामलों में कानून का सम्मान करना चाहिए और व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए।

यह भी पढ़ें- उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का किया गठन, मदरसा बोर्ड एक जुलाई 2026 को होगा खत्म

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