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लद्दाख के बाद गुलमर्ग में 23 फरवरी को होगा बर्फीले खेलों का महाकौशल, सेना की टीम करेगी खिताब बचाने की कोशिश

cy520520 1 hour(s) ago views 249
  

छह साल से लगातार खेलो इंडिया, गुलमर्ग की पहचान बन गई है।



जागरण संवाददाता, श्रीनगर। जैसे-जैसे 23 फरवरी नजदीक आ रही है, समुद्र तल से 2,650 मीटर ऊपर हिमालय पर्वत की गोद में सिथत गुलमर्ग का स्वरूप बदल रहा है। झंडे फहराने की तैयारी हो रही है, टाइमर सेट किए जा रहे हैं, स्की ताज़ी बर्फ पर दौड़ने के लिए रेडी हैं और चीड़ के पेड़ों से ढकी पहाड़ियों में तालियों से गड़गहाट गूंजने को तैयार है।

चार दिनों तक,र्बफीली ढलानें तय करेंगी कि कौन पोडियम पर पहले पहुंच विजय प्राप्त करेगा। लेकिन इस विश्व प्रसिद्ध र्पयटन स्थल पर पदकों और खेलों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण घटना घटित हो रही है। सैना की टीम चैंपियनशिप का खिताब बचाने के लिए मैदान में उतरेगी।

कभी मुख्य रूप से एक पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाने वाला यह स्थल अब राष्ट्रीय खेल केंद्र बन गया है। मोका है गुलमर्ग 23 से 26 फरवरी तक खेलो इंडिया शीतकालीन खेलों के छठे संस्करण की मेजबानी का। स्केटिंग और हाकी जैसे बर्फीले खेलों वाला पहला चरण 20 से 26 जनवरी तक लद्दाख में किया गया था।

यह लगातार छठा वर्ष होगा जब खेल इस हिमालयी घाटी में होंगे। देश का कोई अन्य शहर राष्ट्रीय खेल आयोजन पर ऐसा एकाधिकार होने का दावा नहीं कर सकता। इस निरंतरता ने गुलमर्ग को देश की शीतकालीन खेल राजधानी का खिताब दिलाया है।
गुलमर्ग में चार पदक स्पर्धाएं होंगी

स्की पर्वतारोहण, अल्पाइन स्कीइंग, नार्डिक स्कीइंग (क्रॉस-कंट्री) और स्नोबोर्डिंग। बर्फीली स्पर्धाओं में कम से कम 400 एथलीटों के भाग लेने की उम्मीद है, जिनमें से अधिकांश स्कीयर होंगे, और अल्पाइन स्कीइंग में इनकी संख्या सबसे अधिक होगी। अपने पूर्व भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेलो इंडिया शीतकालीन खेलों को खेल जगत के नए आत्मविश्वास का प्रतीक बताया था।

उन्होंने कहा था कि गुलमर्ग देश का शीतकालीन खेल का मैदान बन गया है, जहां सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के एथलीट एक बर्फीले मैदान में इकट्ठा होते हैं।ये खेल देश की विविधता को प्रदर्शित करते हैं और गुलमर्ग की ढलानें वो जगह हैं जहां भौगोलिक सीमाएँ मिट जाती हैं और प्रतिभाएं एक हो उठती हैं। क्योंकि अंबाला, हैदराबाद, इंदौर, पुणे, मध्य प्रदेश और अन्य स्थानों के प्रतियोगी अपनी तैयारी कर रहे हैं।

कोंगडूरी के पास ऊपरी ढलानों पर, जम्मू के अंकुश एक स्लैलम गेट में झुकते हैं, जिससे उनके पीछे बर्फ़ की एक फुहार उठती है। उनकी स्की लड़खड़ाती हैं, फिर स्थिर हो जाती हैं। स्थानीय खिलाड़ी गजाला हमीद अपने सन गागल्स (धूप का चश्मा )उतारते हुए कहते हैं, यहां आप सिर्फ़ अपने पैरों को ही प्रशिक्षित नहीं करते बलकि आप अपने फेफड़ों, अपनी नसों, अपने धैर्य को भी प्रशिक्षित करते हैं।
यहां रेसिंग करना तलवार पर दौड़ने जैसा

गुलमर्ग आपको बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है। पास ही, जम्मू की कनिका कहती है,इस मंच ने शीतकालीन खेलों को बदल दिया है।खेलो इंडिया से पहले, आप खुद को अनदेखा महसूस करते थे। अब आपको पहचान मिलती है। पुणे के हृषि गुलहाने ऊंचाई के झटके का खुलकर वर्णन करते हैं। उनके अनुसार यहां रेसिंग करना तलवार पर दौड़ने जैसा है। उनके अनुसार यहां का इलाका तकनीकी रूप से कठिन है, बर्फ खिसकती रहती है और आप एक पल के लिए भी आराम नहीं कर सकते,।

“यही बात यहां जीत को खास बनाती है। नए खिलाड़ी भी इस पहाड़ पर आ रहे हैं। हैदराबाद के सुहास रेड्डी, जो एक स्काईडाइवर हैं और स्कीइंग सीख रहे हैं। केरल से आए मुहम्मद शमीम कहते हैं, हम बर्फ के बीच पले-बढ़े नहीं हैं। लेकिन यहां आप किसी बड़ी चीज़ का हिस्सा होने का एहसास करते हैं।

अंबाला के रोहित दबाव को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, जब आप शुरुआती गेट पर खड़े होते हैं तो सन्नाटा छा जाता है। फिर आप दौड़ना शुरू करते हैं और अगले मोड़ के अलावा सब कुछ गायब हो जाता है।
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