search

Lathmaar Holi 2026: श्रीराधा खेलेंगी रंगीली होली, रंग, रस और प्रेम की लाठियों से गूंजेगा बरसाना

deltin33 Yesterday 23:56 views 654
  

बरसाना में लठमार हाेली के दौरान लाठी से वार करती हुरियारिन।  



रसिक शर्मा, मथुरा। फाल्गुन की मादक बयार के साथ ब्रजभूमि में आज वह क्षण उतरने जा रहा है, जब आस्था रंग बनेगी, परंपरा उत्सव बनेगी और प्रेम लीला का रूप ले लेगा।

राधारानी की नगरी बरसाना में विश्व प्रसिद्ध लठामार होली के साथ भक्ति और उल्लास का महासंगम साकार होगा। स्वर्णिम शृंगार में सुसज्जित राधा के आंगन में जब रंगों की बौछार होगी।

तब अबीर गुलाल की उड़ती छटा और प्रेम-पगी लाठियों की परंपरा द्वापरकालीन स्मृतियों को जीवंत कर देगी। ब्रह्मांचल पर्वत से लेकर गलियों तक रंगों का समंदर उमड़ेगा और लाखों श्रद्धालु इस अद्भुत लोक आस्था के साक्षी बनेंगे।

लठामार होली से पहले ही बरसाना में भक्तों का सैलाब उमड़ना शुरू हो गया है। ढोल नगाड़ों, रसिया और समाज गायन के बीच पूरा नगर भक्ति के रंग में रंग चुका है। परंपरा के अनुसार नंदगांव से आए हुरियारे रंगीली चौक में पहुंचेंगे।

जहां बरसाना की हुरियारिनें प्रेमपूर्ण परिहास के साथ लाठियों से उनका स्वागत करेंगी। घूंघट की ओट से लाठियां संभाले गोपियों का उत्साह और ढाल लेकर रंगों में सराबोर हुरियारों का उल्लास इस अनूठी परंपरा को जीवंत लोकनाट्य का स्वरूप देता है।

अबीर गुलाल की धुंध में पहचान मिट जाती है और हर कोई केवल हुरियारा बनकर भक्ति के रंग में डूब जाता है। बरसाना की संकरी गलियों से लेकर लाड़िली जी मंदिर परिसर तक रंगों की छटा बिखर रही है।

समाज गायन की स्वर लहरियां वातावरण को आध्यात्मिकता से भर रही हैं। श्रद्धालुओं का उत्साह ऐसा कि पूरा ब्रह्मांचल पर्वत मानो रंगों के समंदर में डूबने को तैयार दिखाई दे रहा है।

ब्रज की इस परंपरा में स्त्री शक्ति का अद्भुत स्वरूप भी दिखाई देता है। लठामार होली में जहां हुरियारिनें लाठियों के साथ उत्साह से मैदान में उतरती हैं, वहीं हुरियारे ढाल से बचाव करते हुए परिहास और रंगों का आनंद लेते हैं।

यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और नारी शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

बरसाना में आज सुबह रंगीली होली और शाम को लठामार होली का आयोजन होगा, जबकि अगले दिन नंदगांव में इसी परंपरा का आयोजन किया जाएगा। प्रशासन और मंदिर सेवायतों ने श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए हैं।


नारी शक्ति का प्रतीक बनेगी लठामार परंपरा

ब्रजाचार्य नारायण भट्ट ने लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व लठामार होली की परंपरा को व्यवस्थित रूप दिया। मान्यता है कि उस समय महिलाओं को आत्मरक्षा के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से इस परंपरा को होली उत्सव से जोड़ा गया।

उनके ग्रंथ भक्ति प्रदीप और भक्तिरस तरंगिणी में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। लठामार होली आज भी नारी शक्ति और ब्रज संस्कृति का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है।   
like (0)
deltin33administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin33

He hasn't introduced himself yet.

1510K

Threads

0

Posts

4710K

Credits

administrator

Credits
476351