बिहार: मैट्रिक और इंटर में असफल या असंतुष्ट विद्यार्थियों के लिए नया अवसर।
संवाद सहयोगी, जमुई। राज्य में ड्रॉपआउट दर कम कर विद्यार्थियों को मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन (बीबास) के माध्यम से नई पहल की है। मैट्रिक और इंटर की परीक्षा परिणाम के बाद असफल या अपने अंकों से असंतुष्ट विद्यार्थियों के लिए यह एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है।
अन्य बोर्ड के विद्यार्थियों को भी अवसर
बिहार बोर्ड के अलावा Central Board of Secondary Education (सीबीएसई), Council for the Indian School Certificate Examinations (सीआईएससीई) तथा अन्य राज्य बोर्ड के असफल विद्यार्थी भी बीबास के माध्यम से दोबारा परीक्षा देकर अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं। यह व्यवस्था छात्रों को समय और वर्ष की बर्बादी से बचाती है।
- ड्रॉपआउट कम करने में ‘बीबास’ बना सहारा
- असफल विद्यार्थियों को मिला दूसरा मौका
- छात्रों को समय की बर्बादी से बचाती है।
- बेहतर व्यवस्था को लागू करने की बनी है योजना,
क्या है बीबास
बीबास (बिहार मुक्त विद्यालयी शिक्षण एवं परीक्षा बोर्ड) शिक्षा विभाग की स्वायत्त इकाई है, जिसे अन्य मान्यता प्राप्त बोर्डों के समकक्ष दर्जा प्राप्त है। इसके प्रमाण-पत्र तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए वैध माने जाते हैं। इस बोर्ड में वर्षभर नामांकन की सुविधा उपलब्ध है, जबकि परीक्षाएं वर्ष में दो बार आयोजित की जाती हैं।
नामांकन के लिए आवश्यक दस्तावेज
मैट्रिक/इंटर का अंक-पत्र
मैट्रिक/इंटर का प्रमाण-पत्र
पासपोर्ट साइज फोटो
जाति व आवासीय प्रमाण-पत्र
आधार कार्ड एवं बैंक पासबुक
जिले में अध्ययन केंद्र
जमुई जिले के कई विद्यालय बीबास के अध्ययन केंद्र के रूप में पंजीकृत हैं। गिद्धौर स्थित महाराज चंद्रचूड़ विद्यामंदिर मुख्य अध्ययन केंद्र के रूप में कार्य कर रहा है। वर्तमान सत्र में नामांकन कराने वाले विद्यार्थी जून और दिसंबर 2026 में परीक्षा दे सकेंगे। पिछले दो वर्षों में करीब सात हजार परीक्षार्थियों ने बीबास के माध्यम से परीक्षा दी, जिनमें लगभग 72 प्रतिशत छात्र सफल रहे।
जमुई जिले में असफलता को अंत समझ लेने वाले परीक्षार्थियों के लिए ‘बीबास’ एक नई शुरुआत है। विगत दो वर्षों में करीब 7000 अभ्यर्थियों ने मैट्रिक/इंटर की परीक्षा पास की है। वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य में समय और साल बचाने के लिए बीबास बेहतर विकल्प है।” -
- कृष्ण कांत झा, उप समन्वयक, बीबास  |
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