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ललित सुरजन की कलम से - व्यापम : कड़वे सच की परत ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 5

व्यापम में पिछले एक दशक में या शायद उसके भी पहिले जो कुछ हुआ है, उसकी अनेक परतें हमारे सामने खुलती हैं। शिवराज सरकार से पहिले की चर्चा करें तो ध्यान आता है कि व्यापम में धांधली की शिकायतें आज से बीस साल पूर्व भी सुनने मिलती थीं।
अलबत्ता उनका स्वरूप इतना विकराल नहीं था। धनी-धोरी लोग अपने पाल्यों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए परीक्षकों को अथवा अन्य अधिकारियों को घूस देकर अंकसूची में हेरफेर करवाते हैं, ऐसी चर्चाएं तब होती थीं। लेकिन इनमें राजनेताओं के नाम कभी नहीं लिए गए।




कुल मिलाकर जैसे बारहवीं बोर्ड या बी.ए./एम.ए. में नंबर बढ़वाने की जो प्रथा प्रचलित थी, वही व्यापम में भी लागू हो गई थी। सुनते हैं कि अपनी संतान को मेडिकल कॉलेज में दाखिले की व्यवस्था करने के लिए पालक उस समय तीन-चार लाख रुपए तक की रिश्वत दे देते थे।
ऐसे कुछ प्रकरण पकड़े भी गए थे। उन पर क्या कार्रवाई हुई, यह पता नहीं चला। किंतु यदि तत्कालीन सरकारों ने इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया होता तो उसी समय बेहतर विकल्पों पर विचार किया जा सकता था।
(देशबन्धु में 23 जुलाई 2015 को प्रकाशित)     
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/07/blog-post_22.html






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