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ड्रग्स केस में दोषी की याचिका खारिज, दिल्ली HC ने कहा- CCTV न होना बरामदगी खारिज करने का आधार नहीं

deltin33 2025-10-28 18:15:14 views 743
  

प्रतीकात्मक तस्वीर।



विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। दोषी करार देने के मामले में सजा निलंबित करने से जुड़ी याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ड्रग्स बरामदगी की वीडियोग्राफी या सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत न करने से किसी अभियुक्त से की गई प्रतिबंधित सामग्री की जब्ती रद नहीं होती। न्यायमूर्ति रविन्द्र डुडेजा की पीठ ने कहा कि पुलिस अधिकारियों पर केवल इसलिए अविश्वास नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वे सरकारी गवाह हैं, जब तक कि झूठा फंसाने का मकसद साबित न हो जाए। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

पीठ ने कहा जब्ती की वीडियो रिकाॅर्डिंग उपलब्ध न होने पर कहा कि मौजूदा मामला संयोगवश सुबह तीन बजे से हुई बरामदगी का है। इसलिए, सीसीटीवी फुटेज पेश न करना, बरामदगी को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।

पीठ ने कहा कि निश्चित तौर पर एनडीपीएस अधिनियम जब्ती की वीडियो रिकार्डिंग अनिवार्य नहीं करता, लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता- 2023 के लागू होने के साथ यह अनिवार्य हो गया है।

हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि सीसीटीवी फुटेज न एकत्रित करना या वीडियोग्राफी न होना एक कमी हो सकती है, लेकिन ऐसी चूक अपने आप में जब्ती की कार्यवाही को रद नहीं कर सकती। पीठ ने रिकार्ड किया कि वर्तमान मामले में ड्रग्स की बरामदगी लगभग तीन बजे अचानक हुई थी।

पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए एक दोषी द्वारा सजा निलंबित करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाए गए निर्णय में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। दोषी को 25.086 किलोग्राम गांजा रखने के आरोप में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

आरोपित ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को उच्च अदालत में चुनौती दी है और हाई कोर्ट मेें याचिका दायर कर प्रकरण के लंबित रहने तक सजा निलंबित करने की मांग की थी। उसने तर्क दिया था कि सार्वजनिक स्थान पर गांजा बरामद हुआ था और ट्रायल कोर्ट ने केवल पुलिस अधिकारियों की गवाही पर दोषसिद्धी का निर्णय सुनाया था।

यह भी तर्क दिया था कि कोई तस्वीर, वीडियोग्राफी या सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं की गई थी, जबकि वहां पर आस-पास कैमरे लगे हुए थे। हालांकि, पीठ ने कहा कि केवल स्वतंत्र/सार्वजनिक गवाह के शामिल न होने के कारण बरामदगी पर संदेह नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी रिकाॅर्ड किया कि फोरेंसिक रिपोर्ट और पेश की गई बरादगी की विधिवत पुष्टि की गई हो।

यह भी पढ़ें- एएफएमएस संस्थानों में पीजी मेडिकल सीट के आवंटन मामले पर हुई सुनवाई, दिल्ली HC ने केंद्र से मांगा जवाब
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