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Lord Curzon Ki Haveli review: सस्पेंस और डार्क कॉमेडी से भरपूर है रसिका दुग्गल की फिल्म, पढ़ें रिव्यू

LHC0088 2025-10-28 20:21:17 views 948
  

लॉर्ड कर्जन की हवेली रिव्यू



फिल्‍म रिव्‍यू : लॉर्ड कर्जन की हवेली

प्रमुख कलाकार : अर्जुन माथुर, रसिका दुग्‍गल, जोहा रहमान, परेश पाहूजा, तन्‍मय धनानिया, गैरिक हैगन

निर्देशक : अंशुमन झा

अवधि : 108 मिनट

स्‍टार : दो

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। लव सेक्‍स और धोखा फेम अभिनेता अंशुमन झा ने फिल्‍म लॉर्ड कर्जन की हवेली से निर्देशन में कदम रखा है। एक रात की कहानी के जरिए उन्‍होंने अवैध आव्रजन, नस्लीय भेदभाव, वैवाहिक कलह, पितृसत्तामकता, प्रवासी भारतीयों का भारतीय लड़की के साथ शादी का जुनून जैसे मुद्दों को कहानी में दर्शाने की कोशिश की है। यह मुद्दे दिलचस्‍प जरूर है लेकिन उसकी गहराई में नहीं जाते हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

कहानी लंदन के बाहरी इलाके में सेट है। ईरा (रसिका दुग्‍गल) अपने पति डा बासुकीनाथ (परेश पाहूजा) के साथ अपनी अभिनेत्री दोस्‍त सान्‍या (जोहा रहमान) के घर जाती है। सान्‍या के साथ उसका ब्‍वायफ्रेंड रोहित (अर्जुन माथुर) भी होता है। ईरा के जूस में रोहन शराब मिला देता है। रोहन कमरे में रखे बक्‍से को लेकर बासुकी से मजाक करता है कि उसमें एक ब्रिटिश शख्‍स की लाश है। बासुकी मजाक को गंभीरता से लेता है। उसे बक्‍से से ठक ठक की आवाज आती है। आखिरकार वो बक्‍सा खोलने में कामयाब रहता है। पर उसका तरीका अजीबोगरीब लगता है। खोलने पर उसमें कोई लाश नहीं मिलती। फिर सब मिलकर साथ में एक खेल खेलते हैं। वहां से उनकी जिंदगी की परतें खुलना आरंभ होती हैं। इस दौरान शराब का असर ईरा पर हो चुका होता है। उसकी दबी आकांक्षाए और आक्रोश बाहर आता है। पर रोहन के मजाक के पीछे क्‍या रहस्‍य है? एक रात में उनकी जिंदगी कैसे बदलती है कहानी इस संबंध में है।

  

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कई फिल्‍म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने के बाद लॉर्ड कर्जन की हवेली सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। शीर्षक में लार्ड कर्जन है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के वायसराय रहे लॉर्ड कर्जन निरंकुश शासक और कट्टर नस्लवादी थे। फिल्‍म में प्रतीकात्मक तौर पर इस्तेमाल इस नाम के जरिए भारतीयों के प्रति ब्रिटिश मानसिकता बताने का प्रयास किया गया है। हालांकि कहानी को स्‍थापित करने में लेखक बिकास मिश्रा काफी समय लगाते हैं और आपके धैर्य की परीक्षा लेते हैं।

इंटरवल के बाद पात्रों की जिंदगी की परतें और मन की गाठें खुलती हैं। इस दौरान लार्ड कर्जन के शव के इर्द-गिर्द छिपे रहस्य के साथ लेखक उस पहचान के मुद्दे को भी उठाते हैं जिससे अप्रवासी जूझते हैं और उनमें असुरक्षा की भावना पैदा होती है। एक बंद कमरे में रहस्य की तरह लिखी गई यह फिल्म अपने केंद्रीय पात्रों के मूल में छिपे क्रोध के बारे में किसी को भी आश्वस्त नहीं कर पाई है। बासुकी खुद को ब्रिटिशर कहलाने में गर्व महसूस करता है, लेकिन पंजाब से एक घरेलू, पारंपरिक भारतीय पत्नी चाहता है। उसकी वजह स्‍पष्‍ट नहीं है। पूरी फि‍ल्म एक ही घर में शूट की गई है तो सिनेमैटोग्राफी ज़्यादा कुछ नहीं जोड़ती है। रहस्‍य को गाढ़ा करने में संगीत भी कोई खास भूमिका नहीं निभाता है।

  

बहरहाल, फिल्‍म का खास आकर्षण है रसिका दुग्गल। उनकी कामिक टाइमिंग खासकर वन-लाइनर्स बहुत सटीक है। भावी दुल्हनों को \“इंडियन आइडल ऑडिशन\“ की तरह परखने या शराब पीने के पाखंड पर उनके संवाद चुटकीले हैं। परेश पाहूजा ने डा बासुकी के अजीबोगरीब व्‍यवहार और सनक को बखूबी आत्‍मसात किया है लेकिन लेखन स्‍तर पर उनका पात्र कमजोर है। अर्जुन माथुर का अभिनय भी उल्‍लेखनीय है। वह रोहन के आक्रोश, संघर्ष को संयमित और संतुलित तरीके से व्‍यक्‍त करते हैं। जोहा अपनी भूमिका में आकर्षक लगी है। बांग्लादेशी पिज्‍जा डिलीवरी ब्‍वाय की संक्षिप्‍त भूमिका में तन्मय धनानिया प्रभावित करते हैं।

  

कुल मिलाकर बाहर से लार्ड कर्जन की हवेली आकर्षक दिखती हैं अंदर आने पर वह उस आकर्षण को बरकरार नहीं रख पाती है। वह भावनात्‍मक रूप से खोखली लगती है।

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