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दिल्ली AIIMS में मरीजों का इलाज शुरू होने से पहले ही इम्तिहान; PHOTOS देख आंखें हो जाएंगी नम!

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एम्स के बाहर पर्चे के लिए कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे लाइन लगाए मरीज और तीमारदारएम्स प्रशासन द्वारा बनाए गए आश्रय सदन में ठंड से दूर आराम करते मरीज और तीमारदार। जागरण






जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। घने कोहरे और शरीर को चीरती ठंडी हवा के बीच एम्स के मुख्य गेट के बाहर शुक्रवार तड़के तीन बजे जमीन पर कंबल बिछाए मरीज और उनके तीमारदार बैठे हैं। कोई करवट बदल रहा है तो कोई दर्द से कराह रहा है, तो नींद से लड़ते हुए सुबह होने का इंतजार कर रहा है।

एम्स में इलाज कराने के लिए पर्चा और अप्वाइंटमेंट के लिए मरीजों व तीमारदारों की परीक्षा इसी तरह हर सुबह कड़ाके की ठंड में होती है। एम्स प्रशासन ने मरीजों और तीमारदारों के लिए आश्रय सदन की व्यवस्था की है, जहां करीब 1500 बेड हैं, लेकिन विडंबना है कि अप्वाइंटमेंट पाने को कतार में बने रहने के लिए लोगों को आश्रय छोड़कर खुले आसमान के नीचे ठंडी फर्श पर बैठना या लेटना पड़ता है।

बलिया से आए एक मरीज के परिजन अनादि शर्मा बताते हैं कि आश्रय सदन है, लेकिन वहां गए तो लाइन छूट जाएगी। इलाज चाहिए, इसलिए ठंड सहनी पड़ रही है।

  

एम्स के बाहर पर्चे के लिए कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे लाइन लगाए मरीज और तीमारदारएम्स प्रशासन द्वारा बनाए गए आश्रय सदन में ठंड से दूर आराम करते मरीज और तीमारदार। जागरण

नंगी फर्श बर्फ की तरह ठंडी है। कहीं बुजुर्ग शरीर समेटकर लेटे हैं, तो कहीं महिलाएं बच्चों को सीने से लगाए ठंड से बचाने की कोशिश कर रही हैं। बिहार के दरभंगा जिले से आए एक बुजुर्ग मरीज धीमी आवाज में कहते हैं कि नाम मत लिखिए, डर लगता है। इलाज अटक गया तो क्या करेंगे‌, यहां तो बीमारी से पहले पर्चे की लाइन में ही ठंड मार डाल रही है।

आसपास बैठे लोग चुप रहते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर छाया दर्द और ठंड की मार सब कुछ कह देती हैं। रात के समय पर्चे के लिए कोई औपचारिक टोकन या स्पष्ट व्यवस्था नहीं दिखती है। लोग आपस में कागज पर नंबर लिखकर, कंबल या चादर रखकर अपनी जगह तय करते हैं।

  

देश के सबसे बड़े और भरोसेमंद सरकारी अस्पतालों में शुमार एम्स पर लोगों का भरोसा ही उन्हें शीतलहर, तेज हवा और कड़ाके की ठंड में भी यहां खींच लाता है। लेकिन अस्पताल के बाहर की यह तस्वीर राष्ट्रीय राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर तीखा सवाल खड़ा कर रही है कि क्या इलाज की शुरुआत खुले आसमान के नीचे, कांपती रातों और ठंडी फर्श से ही होनी चाहिए।

  

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