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स्कूली बच्चों पर बुलिंग का खतरा: पेरेंट्स क् ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 63

कभी कभी बच्चे मजाक में एक दूसरे को तंग करते हैं, लेकिन कई बार कुछ बच्चे दूसरे पर हावी होने लगते हैं, यानी बुली करते हैं. विशेषज्ञों की मानें तो बुली होने वालों के साथ, परेशान करने वाले बच्चे की भी काउंसिलिंग होनी चाहिए.  
एक 9 साल की बच्ची अमायरा ने एक नवंबर 2025 को जयपुर में अपने स्कूल की चौथी मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमायरा स्कूल में बुली का शिकार हो रही थी. इसकी शिकायत उसके पेरेंट्स ने कई बार शिक्षकों से भी की थी, लेकिन स्कूल की ओर से कोई एक्शन नहीं लिया गया. खबरों में यह भी बताया गया है कि अमायरा ने आत्महत्या करने से पहले भी लगभग पौन घंटे में पांच बार अपनी टीचर से मदद मांगी लेकिन शिक्षकों ने इस बात को अनसुना कर दिया था. इस मामले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने जांच कर स्कूल की मान्यता रद्द की.  




बच्चों से लें दिनचर्या का हाल  
लखनऊ के एलडीए कॉलोनी की रहने वाली श्वेता की नौ वर्ष की बेटी है. श्वेता का कहना है कि वैन से स्कूल जाने के दौरान बच्चों में सीट को लेकर झगड़ा या फिर उनके नाम को लेकर चिढ़ाने जैसी कई छोटी-छोटी बातें उनकी बेटी उन्हें बताती है. श्वेता कहती हैं कि मैं हर शाम अपनी बेटी की पूरी दिनचर्या के बारे में उससे पूछती हूं ताकि उसके जीवन में जो भी घटित हो रहा हो मुझे उसकी जानकारी रहे. हालांकि श्वेता के अनुसार बच्चों में इस तरह के छोटे-मोटे झगड़ों के अलावा रंगभेद जैसी कोई अन्य बात अब तक उनकी बेटी ने अनुभव नहीं की है.  




बच्चों के मन में आने वाले ख्यालों के बारे में हमने डॉ पियाली भट्टाचार्य से बात की. डॉ प्याली लखनऊ के संजय गांधी स्नाकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में बाल रोग विशेषज्ञ हैं. उनका कहना है कि वैसे तो इस उम्र के बच्चे आपस में मस्ती मजाक करते हैं और इस दौरान छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे को चिढ़ाना लाजमी है, लेकिन जब बात रंगभेद या बुली करने की आती है तो यहां मामला गंभीर हो जाता है.  
स्कूल के बच्चों में बढ़ रही आत्महत्या की दर कितनी खतरनाक?  




डॉ पियाली रहती हैं, "जब छोटे बच्चे अपने हमउम्र को बुली करने लग जाएं या रंग के आधार पर किसी बच्चे को चिढ़ाएं तो इस तरह के बच्चों की काउंसलिंग किए जाने की सबसे अधिक जरूरत होती है. हो सकता है इन बच्चों को भी कहीं न कहीं परेशान किया गया हो या फिर उनके आस पड़ोस में इस तरह की बातें की जाती हों." डॉ पियाली का यह भी कहना है कि कई बार इस तरह के बच्चों को दूसरों को चिढ़ाने में खुशी मिलती है. इस लिहाज से भी जब कोई बच्चा दूसरे को चिढ़ा रहा हो तो दोनों ही बच्चों की समय पर काउंसलिंग की जानी जरूरी है.  




बुली करने और होने के पीछे क्या है कारण  
बुली होने की स्थिति में अक्सर बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगते हैं या फिर जरूरत से अधिक शांत रहने लगते हैं. लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट और प्रोफेसर डॉ पूजा माहौर कहती हैं, "बुली करना एक हानिकारक, अपमानजनक और पीड़ित करने वाला व्यवहार है जो दूसरे व्यक्ति को भावनात्मक, सामाजिक और शारीरिक पीड़ा पहुंचाता है."  
डॉ पूजा का कहना है कि बुली होने वाले बच्चे अक्सर स्कूल जाने से कतराने लगते हैं. बच्चे डर या चिंता में रहने लगते हैं, या फिर जरूरत से अधिक शांत रहने लगते हैं जिसकी वजह से उनके स्कूल परफॉर्मेंस पर, रोजमर्रा के कामकाज और मानसिक क्षमता पर प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा कुछ और भी लक्षण देखे जा सकते हैं जैसे अनसेफ महसूस करना, कमजोर वा असहाय महसूस करना, कई स्थितियों में आत्महत्या जैसे विचार भी बच्चों में आ सकते है.  

डॉ. पूजा कहती हैं कि बुली होने वाले बच्चे मानसिक तौर पर कमजोर होते हैं. बुली होने पर वह खुद को संभाल पाने की स्थिति में नहीं होते और ऐसे में समाज से कटने लगते हैं. घर परिवार में, टीचर्स के साथ या दोस्तों के साथ अपनी समस्याओं को शेयर नहीं करते हैं. मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते या तो डिप्रेशन, एंग्जाइटी या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थिति में भी जा सकते हैं.  
डॉ पूजा कहती हैं, "अक्सर बच्चों के साथ ही गोरे और सांवले रंग को लेकर मतभेद किया जाता है. शारीरिक बनावट को लेकर कमेंट किए जाते हैं. कभी-कभी स्कूलों में भी देखा जाता है कि जो बच्चे दिखने में सुंदर हो उन्हें स्टेज या परफॉर्मेंस करने के अवसर अधिक मिलते हैं, बुली करने वाला व्यक्ति खुद से कमजोर बच्चों के साथ में अभद्र भाषा का प्रयोग, मार पिटाई, ताने कासना, डराना धमकाना आदि व्यवहार कर सकते हैं.  

बुली करने वाले की भी मनोदशा होती है कमजोर  
बुली होने वाले बच्चों के साथ-साथ बुली करने वाले बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी डॉक्टर पूजा ने कई बातें बताईं. डॉ पूजा माहौर के अनुसार, बुली करने वाले बच्चों में भी कई स्तरों पर साइकोलॉजिकल परेशानियां हो सकती हैं. ऐसे बच्चे जो कंडक्ट डिसऑर्डर, एंटीसोशल टेंडेंसीज, डिफाइन डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्याओं से ग्रसित होते हैं. उनमें बुली करने की भावनाएं सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक होती हैं.  

डॉ. पूजा कहती हैं, "बच्चों को अगर किसी बात के लिए ताने मारे जाएं या फिर घर या आस पास के किसी अन्य बच्चे के साथ कंपेयर किया जाए तो इससे उनमें तनाव की स्थिति या फ्रस्ट्रेशन आ जाता है. इसकी वजह से भी वह दूसरे बच्चे पर हावी होने की कोशिश करते हैं और अंततः बुली जैसी परेशानियां देखने को मिलती हैं."  
इसके अलावा बच्चों के आस-पड़ोस या परिवार का माहौल तनाव भरा हो, जहां लड़ाइयां या हिंसा जैसी बातें होती हों तो ऐसी स्थितियों से सीखकर बच्चे दूसरे बच्चों को परेशान करने लगते हैं.  

फिजिकल बुलीइंग में लड़के, तो इमोशनल में लड़कियां निशाने पर  
मनोचिकित्सकों को यह भी देखने को मिल रहा है कि जिन घरों में लड़ाई झगड़े का माहौल हो या किसी तरह की अपराधिक प्रवृत्ति हो तो ऐसे में भी बच्चे बुली करना आसानी से सीख जाते हैं. इसके साथ ही यदि कोई बच्चा कभी खुद भी बुली किया गया हो तो वह अपनी कुंठा को निकालने के लिए दूसरे बच्चों को बुली करने का रास्ता अपना सकता है.  
डॉ पूजा बताती हैं कि ज्यादातर अभिभावक बुली किए गए बच्चों को ही काउंसलिंग और थेरेपी के लिए डॉक्टर तक पहुंचाते हैं. डॉ पूजा की ओपीडी में हर सप्ताह करीब 2 से 3 बच्चे ऐसे आते हैं जिनको उनको हमउम्र बच्चों ने ही परेशान किया है. बुलीइंग की समस्या लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में ज्यादा देखने मिलती है. सोशल/फिजिकल बुलीइंग लड़कों में और इमोशनल बुलीइंग लड़कियों में ज्यादा रिपोर्ट की जाती है.  

बच्चों के आसपास का माहौल ऐसे सुधारें  
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों का मन उस गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे किसी भी तरह से ढाला जा सकता है और फिर यही ताउम्र उनके साथ चलता है. ऐसे में मानसिक विकास की उम्र में बच्चों पर नजर बनाए रखना सबसे अहम है. बच्चे अकसर डर के माहौल में ही परेशान किए जाते हैं. ऐसे में बच्चों को अपनी हर तरह की बात अभिभावक या गार्जियन के सामने रखने की आजादी मिलनी चाहिए ताकि उनके साथ हो रहे किसी भी तरह के दुर्व्यवहार का समय पर पता चल सके.  

बच्चों के द्वारा बुली होने के बाद पर उन पर ही दोष नहीं मढ़ा जाना चाहिए. डॉ पूजा कहती हैं, "कई मामलों मैं देखा गया है कि जब बच्चे अपनी परेशानी पेरेंट्स से साझा करते हैं तो उन्हें यह कहकर चुप कराया जाता है कि इसमें कहीं ना कहीं गलती उसी बच्चे की होगी. इससे बच्चों के अंदर खुद के दोषी होने की बात घर कर जाती है और उनका आत्मविश्वास डगमगाता है."  
हमउम्र बच्चों को आपस में एक दूसरे को परेशान करने की स्थिति से बचने के लिए कई स्कूलों में काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट भी रखे जा रहे हैं जो उनकी मेंटल हेल्थ पर नजर रखते हैं. डॉ पूजा कहती हैं कि स्कूलों में मानसिक समस्याओं को प्राथमिक स्तर पर समाधान करने के लिए काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञों की व्यवस्था होनी चाहिए. डॉ. पूजा कहती हैं, "माता-पिता अपने बच्चों की दिक्कतों को ध्यान से समझें और अगर कुछ भी असमान्यता दिखाई दे तो बिना छुपाए उसका इलाज ढूंढें. बुली होने वाले बच्चों के लिए काउंसिलिंग और स्पेशलिस्ट एक बढ़िया विकल्प हो सकता है."







Deshbandhu Desk




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