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जीविका से बदली किस्मत
जागरण संवाददाता, पटना। मकर संक्रांति का पर्व नजदीक आते ही गया शहर की गलियों और छतों पर रंग-बिरंगी पतंगों की चहल-पहल बढ़ गई है। इस उत्सव के पीछे केवल बच्चों और युवाओं की उमंग ही नहीं, बल्कि उन हाथों की मेहनत भी है, जो दिन-रात पतंग बनाकर आसमान को रंगीन करने के साथ अपनी आजीविका को भी मजबूती दे रहे हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी गया के प्रसिद्ध दुखहरनी मंदिर के समीप रहने वाले परिवार की है, जहां 31 वर्षीय चंपा देवी और 22 वर्षीय आरती कुमारी पूरे समर्पण के साथ पतंग निर्माण में जुटी हैं।
चंपा देवी बताती हैं कि उनके परिवार में पतंग बनाने का काम पीढ़ियों से चला आ रहा है। पति, ससुर और उससे पहले की पीढ़ियां भी इसी पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ी रहीं। हालांकि सीमित पूंजी और संसाधनों के कारण पहले उनका कारोबार केवल स्थानीय फुटकर बिक्री तक ही सीमित था। कई बार बाहर से थोक ऑर्डर भी आते थे, लेकिन आर्थिक मजबूरियां आगे बढ़ने से रोक देती थीं।
यहीं से जीविका योजना उनके लिए बदलाव की नई राह बनकर सामने आई। जीविका से मिले आर्थिक सहयोग और मार्गदर्शन ने पारिवारिक व्यवसाय को नई ऊर्जा दी। उत्पादन क्षमता बढ़ी और कारोबार का दायरा भी फैलता चला गया। आज उनका घर किसी छोटे कारखाने से कम नहीं लगता। हर कमरे में सलीके से सजी रंगीन पतंगें हैं, जिन्हें मकर संक्रांति की बढ़ती मांग को देखते हुए पहले से तैयार कर भंडारण किया जा रहा है।
चंपा देवी गर्व से बताती हैं कि अब उनके द्वारा बनाई गई पतंगें केवल गया तक सीमित नहीं रहीं। वजीरगंज, बोधगया, चंदौती और खिजरसराय के अलावा नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और झारखंड के चतरा व हजारीबाग तक उनकी पतंगों की मांग है। पारंपरिक हुनर अब क्षेत्रीय पहचान बनता जा रहा है।
मकर संक्रांति के दिनों में गया का आकाश भी किसी उत्सव स्थल से कम नहीं दिखता। रामशिला और ब्रह्मयोनि पहाड़ से लेकर घरों की छतों तक पतंग उड़ाते बच्चे और युवा दिखाई देते हैं। सांप की तरह लहराती रंग-बिरंगी पतंगें आसमान में खेलती नजर आती हैं और यह दृश्य बेहद मनमोहक बन जाता है।
नीतीश सरकार की महिला सशक्तीकरण की नीतियों से विकसित जीविका का आर्थिक इको-सिस्टम आज ऐसे ही परिवारों की किस्मत संवार रहा है। आर्थिक सहायता के साथ प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की सुविधा ने चंपा देवी को आत्मनिर्भर बनाया है। कभी सीमित संसाधनों में सिमटा पारिवारिक व्यवसाय आज पूरे परिवार के लिए रोजगार का मजबूत आधार बन चुका है।
जहां एक ओर आकाश पतंगों से सजा है, वहीं चंपा देवी जैसी महिलाएं अपने हुनर और आत्मनिर्भरता से नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। जीविका के सहारे वे परंपरा को भविष्य से जोड़ते हुए सशक्तीकरण की नई उड़ान भर रही हैं। |
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