उत्तरकांड में परम बुद्धपुरुष भुशुंडी महाराज मौन हैं
मोरारी बापू (प्रसिद्ध कथावाचक)। रामचरितमानस के सातों सोपान में केंद्र में कोई न कोई व्यक्ति मौन है। बालकांड में एक मौन पात्र है अहल्या। न किसी से बोलना है, न किसी से कुछ कहना है, न सुनना है। पत्थर की तरह पड़ी है। पशु पक्षी, खग मृग, जीव जंतु, ऋषिकुल के आचार्य, सब निकल गए। केवल अहल्या मौन पड़ी है। मौन उद्धार कर देता है। मौन से निष्पन्न स्तुति प्रभु को करुणा करने के लिए मजबूर कर देती है। भगवान राम से वह कहती है कि मैं अति अपवित्र स्त्री हूं, लेकिन आज मुझे आनंद की कोई सीमा नहीं है। मेरे सामने जगपावन खड़े हैं।
अयोध्या कांड में तीन-चार पात्र मौन हैं। एक तो शत्रुघ्न मौन हैं। केवल विवाह में जिनका जिक्र किया गया, वे तीनों रघुकुल की वधुएं उर्मिला(Sacrifice of Urmila), मांडवी और श्रुतकीर्ति मौन हैं। अरण्य कांड में जाएं तो शबरी मौन है। गुरु के वचन पर भरोसा करके प्रतीक्षारत शबरी मौन बैठी है।
जब अवसर आए तब बोलो तो मौन टूटता नहीं है। जब राम आए तो वो रो उठी। मौन रहने वाला अवसर आने पर बोलता है तो परम तत्व भी उससे मार्गदर्शन प्राप्त करता है। शबरी से राम ने पूछा- जनकसुता कइ सुधि भामिनी। हे भामिनी, जानकी जी कहां मिलेंगी, इस बारे में हमारा मार्गदर्शन करो।
किष्किंधाकांड में दो पात्र मेरी दृष्टि में मौन हैं। एक है बालि की पत्नी तारा। वह अवसर आने पर अपने पति को सावधान करने के लिए बोलती है-
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्राम।।
दूसरी परम साधिका स्वयंप्रभा मौन है। बंदरों को मार्गदर्शन देने और कुछ भक्ति को प्राप्त करने की तरकीब दिखाने के लिए ही वो बोली। सुंदरकांड का मौन पात्र त्रिजटा है। जरूरत पड़ी तो जानकी जी को मार्गदर्शन करने के लिए ढाढ़स देती है। सुंदरकांड में एक पात्र और है, जो मौन है।
वह है हनुमान जी की यात्रा में बाधा डालने के लिए आने वाली सिंहिका नामक राक्षसी। वह कुछ बोलती नहीं। हनुमान जी को गिराने की चेष्टा करती है। ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो बोलते नहीं लेकिन दूसरों को पछाड़ने के लिए प्रयास करते रहते हैं। जिन्होंने उड़ान भरी हो, उनको कैसे गिराया जाए, इस मूढ़ता में लगे रहते हैं।
जानकी जी भी मौन हैं। किसी को सावधान करने के लिए वह समय-समय पर बोली हैं। अगर दिखता हो कि आदमी गिरने वाला है, उस समय मौन तोड़कर उसके हित के लिए सत्य बात कहने से मौन भंग नहीं होता। ऐसा एक पात्र लंका कांड में है रावण की पत्नी मंदोदरी। वह रावण को सावधान करने के लिए बोलती हैं। कभी-कभी बहुत कड़वा बोली हैं, लेकिन हित के लिए ही बोली हैं। उत्तरकांड में परम बुद्धपुरुष भुशुंडी महाराज मौन हैं। वह रामकथा कहते हैं या आत्मकथा या परमात्मकथा। और कोई चर्चा नहीं।
मौन बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन मौन मुस्कुराता हुआ होना चाहिए। आज के युग में चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ मौन रहना तप के समान है। मौन रखें और मुंह को चढ़ा कर रखें, यह ठीक नहीं है। मौन के साथ मुस्कुराहट होनी चाहिए। मैं तो कहता हूं साथ में रामचरितमानस होनी चाहिए। हाथ में माल हो और मंत्र का जाप हो।
मौन का पहला लाभ यह है कि हम वाचिक झूठ से बच जाते हैं। वाचिक झूठ ने आध्यात्मिक पर्यावरण को बहुत दूषित कर रखा है। वाचिक झूठ के इतने बादल हमने आसमान में खड़े कर दिए हैं कि बरखा नहीं आ पाती। मौन हो तो वाचिक झूठ छूट ही जाता है। छोड़ना पड़ता है, मजबूरी है क्योंकि बोल नहीं पाएंगे। हमारे यहां गुजराती में कहावत है- न बोले, उसमें नौ गुण। एक गुण यह है कि हमारी जीभ से किसी की निंदा नहीं होती। बिल्कुल स्थूल फायदा तो है, लेकिन मौन का पहला अच्छा लाभ है। दूसरा लाभ, हम असत्य से बच जाते हैं।
भले ही मन में सत्य घूमता हो, लेकिन वाणी का सत्य छूट जाता है। मौन रहने का तीसरा लाभ है, किसी से वैर नहीं होगा, क्योंकि बोलने से वैर होता है। शत्रुघ्न शत्रुघ्न है। कोई शत्रु ही नहीं, क्योंकि चुप हैं, मौन (Silence of Mythological Characters) हैं। चौथा लाभ यह है कि मौन में किसी से क्षमा नहीं मांगनी पड़ती, क्योंकि हम गलत बोले ही नहीं हैं तो क्षमा मांगने की आवश्यकता ही नहीं। पांचवां लाभ, बाद में पछताना नहीं पड़ता। हम कुछ भी बोल देते हैं, फिर मलाल रहता है कि ऐसा क्यों बोला। छठा लाभ, मौन रहने से समय का दुरुपयोग नहीं होता।
बोल-बोल कर जो समय बर्बाद करते हैं, उससे बच जाते हैं। सातवां लाभ, किसी कार्य का बंधन नहीं होता। मौन हैं तो कुछ करना नहीं। आठवां लाभ, अपने वास्तविक ज्ञान की रक्षा होती है। अपना अज्ञान मिटेगा। धीरे-धीरे चिंतन शुरू होगा, मनन होगा। नौवां फायदा, धीरे-धीरे, क्रमशः अंतःकरण में शांति गंगा की तरह उतरेगी। मौन कोई साधना नहीं है, कोई व्रत भी नहीं है। हां, मौन रखकर आप जप करें तो साधना है और यह साधना बहुत अच्छी है। मौन के अपने शब्द होते हैं। मौन का एक नाद होता है। मौन भाषा मुक्त है।
उसकी कोई भाषा नहीं, कोई व्याकरण नहीं, कोई मूलाक्षर नहीं। भाषा की विधा से मुक्त एक सुर होता है मौन का। उसे कोई लिपि में आबद्ध नहीं किया जा सकता। मौन की अपनी एक सुरावली होती है। मौन स्पर्श करता है। मौन रस की सृष्टि करता है, मौन रस की वृद्धि करता है। मौन का अपना एक रूप होता है।
मौन (Wisdom of Mandodari) सुना जाता है। मौन संक्रामक है। किसी का मौन हो तो आसपास के लोग भी चुप रहते हैं या धीरे-धीरे बोलते हैं। मौन की एक आकृति है। मौन दिव्य दर्शन कराता है। मौन दिव्य दृष्टि दे सकता है। मौन दिव्य नासिका दे सकता है। मौन दिव्य वाणी दे सकता है। |