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स्वामी विवेकानंद ने देवघर से लिख थे 5 पत्र, बाबा बैद्यनाथ मंदिर में बैठकर घंटों करते थे चिंतन

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स्वामी विवेकानंद। फाइल फोटो



आरसी सिन्हा, देवघर। दुनियाभर में अध्यात्म, मानवतावाद और भारतीय वैदिक दर्शन का पताका फहराने वाले स्वामी विवेकानंद बाबा वैद्यनाथ की नगरी देवघर कई बार आ चुके हैं। वे शिकागो के धर्म सम्मेलन में जाने से पहले और सम्मेलन से लौटने के बाद भी यहां आए थे।

पहली बार वह 1887 की गर्मियों में यहां आए, जब बीमार थे। गुरु भाइयों के अनुरोध पर स्वास्थ्य लाभ के लिए वह देवघर आए और सिमुलतला में रुके थे। शिकागो से लौटने के दो साल बाद 1899 में वह फिर देवघर आए और बाबा बैद्यनाथ की पूजा की।

पंडा स्व. हरिचरण मिश्रा ने बाबा के दर्शन कराए थे। स्वामी जी माता पार्वती मंदिर के चबूतरा पर घंटों बैठा करते थे। स्वामी विवेकानंद ने पंडा की पोथी में अपने विचार लिखकर हस्ताक्षर किए थे। स्वामी जी का हस्तलेख रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ के म्यूजियम में संरक्षित हैं।

स्वामी विवेकानंद का करीब छह से सात बार देवघर आगमन हुआ। मकसद स्वास्थ्य लाभ या तीर्थयात्रा था। अमूमन वह दिसंबर व जनवरी में ही आए। स्वामी जी का हस्तलेख रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ के म्यूजियम में संरक्षित है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में स्वामी विवेकानंद वह सेतु हैं, जो प्राचीन और नवीन भारत का परस्पर आलिंगन करते हैं। रवींद्र नाथ टैगोर ने कहा था कि भारत को समझना है, तो विवेकानंद को पढ़िए।

इस महान साधक ने झारखंड के देवघर की भी यात्रा की थी। देवघर वह तपोभूमि और शक्तिपीठ है। पावन धरा पर बाबा बैद्यनाथ विराजमान हैं। वे शिकागो के धर्म सम्मेलन में जाने से पहले और सम्मेलन से लौटने के बाद यहां आए थे।
देवघर प्रवास के वक्त लिखे थे पांच पत्र

स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखने में बहुत रुचि थी। वह अपने मित्रों से इसके माध्यम से आत्मीयता बनाए रखते थे और कुशल क्षेम के साथ संदेश भी देते थे। देवघर प्रवास के समय भी यहां से पांच पत्र लिखे हैं। विवेकानंद की पत्रावली में भी यह दर्ज है। उन्होंने जितने पत्र लिखे उनका उसमें उल्लेख है।

स्वामी जी का 24 दिसंबर 1889 को देवघर आगमन हुआ था। बताते हैं कि वह पूर्ण बाबू की कोठी में रुके थे। अपने मित्र बलराम बसु को लिखे पत्र में इसकी चर्चा भी की। उन्होंने लिखा, “यहां के पानी में आयरन है, इसलिए स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कल बनारस चला जाऊंगा।“

इसके दो दिन बाद 26 दिसंबर को मित्र प्रमदा दास को पत्र लिखा, “देवघर में एक कोलकाता निवासी के मकान में दो चार दिन से हूं, किंतु वाराणसी जाने के लिए चित्त अत्यंत व्याकुल है। कुछ दिन वाराणसी में ही रहने की अभिलाषा है। देखते हैं श्रीविश्वनाथ एवं श्री अन्नपूर्णा क्या करती हैं।“
स्वास्थ्य लाभ के लिए आते थे देवघर

तीन जनवरी, 1898 को जब वह देवघर आए तो यहां से मृणालिनी बसु को पत्र लिखा। पत्र का आरंभ \“मां\“ के संबोधन से था। पत्र में बाल विवाह, विधवा विवाह, सामाजिक नियमों के परिवर्तन पर किए गए सवाल का जवाब दिया था। हालांकि यह भी लिखा कि इतने कठिन सवालों का जवाब छोटे से पत्र में नहीं दिया जा सकता है।

दिसंबर 1898 में जब वह देवघर आए, तब यहां से ओलि बुल को पत्र लिखा। उसमें लिखा था कि यूरोप व अमेरिका में शीघ्र ही आकर मिलूंगा। पत्र में आरोग्य की चर्चा की। जो यह दर्शाता है कि वह स्वास्थ्य लाभ के ख्याल से यहां आए थे।

आज भले ही वह कोठी नहीं है, जहां वे रुके थे पर लोग जानते हैं कि यहां बंगाली कोठी हुआ करती थी। जहां लोग स्वास्थ्य लाभ के मद्देनजर आते थे।
1890 में भागलपुर होते हुए देवघर आए

समाज सुधारक राजनारायण बोस से मिले घर से उनका गहरा रिश्ता रहा। पहली बार उनका आगमन 1887 की गर्मियों में हुआ था। तब भी वह बीमार थे। गुरु भाइयों के अनुरोध पर वे बाबाधाम आए थे। उसके बाद सिमुलतला चले गए थे।

1890 के जुलाई महीने में वे भागलपुर आए थे। यहां से वे अखंडानंद जी के साथ लखीसराय और वहां से देवघर आए थे। उस समय समाज सुधारक ब्रह्मसमाज के राजनारायण बोस पुरनदाहा में ही रहते थे। यहीं पर उनकी विवेकानंद से मुलाकात हुई थी।

पुरानी तथा आधुनिक काल की घटनाओं, ब्रह्मसमाज जैसे गूढ विषयों पर चर्चा हुई थी। कुछ कालखंड के बाद स्वामी जी वैश्विक पटल पर प्रसिद्ध होने लगे तब राजनारायण बोस को समझ में आया कि इस संन्यासी से तो हम पूर्व में मिले थे।
आरकेमिशन में जीवंत होते स्वामी विवेकानंद के आदर्श

भारत की वैभवता की आभा का आकलन और भारतीय सभ्यता व संस्कृति का ताना बाना शिकागो के धर्म सम्मेलन से दुनिया को बताने वाले स्वामी विवेकानंद के आदर्श का दीपक एक सौ साल से अधिक से झारखंड के देवघर में स्थापित रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ जला रहा है।

रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ स्वामी विवेकानंद का मनुष्य निर्माण और चरित्र निर्माण की शिक्षा को आधारभूत रूप देने का प्रयास कर रहा है। स्वामी विवेकानंद के मैन-मैकिंग एंड कैरेक्टर बिल्डिंग एडुकेशन के साये में यहां का दैनिक कार्यक्रम चलता है


विवेकानंद पर उपलब्ध साहित्य के मुताबिक स्वामी जी का देवघर आगमन छह से सात बार हुआ है। वे यहां बाबा के दर्शन करने व स्वास्थ्य लाभ के लिए आए। काशी जाने के दौरान भी वे यहां रुके थे। यहां से कई पत्र भी लिखे थे। -जयंतानंद जी महाराज, सचिव, रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, देवघर
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