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26 जनवरी 1950 को कैसे मनाया गया था भारत का पहला गणतंत्र दिवस? (Image Source: X)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि भारत के पहले गणतंत्र दिवस की परेड कर्तव्य पथ पर नहीं हुई थी? आज जब हम 26 जनवरी की बात करते हैं, तो हमारी आंखों के सामने कर्तव्य पथ की भव्य परेड और झांकियां आ जाती हैं, लेकिन 1950 का वह ऐतिहासिक दिन बिल्कुल अलग और अनोखा था (India\“s First Republic Day)।
जी हां, उस दिन उत्सव का केंद्र कर्तव्य पथ नहीं, बल्कि दिल्ली का \“गवर्नमेंट हाउस\“ और \“इरविन एम्फीथिएटर\“ था। यह वह दिन था जब भारत ने गंभीर समारोहों के बीच एक संप्रभु और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपनी नई पहचान बनाई थी। आइए, इतिहास के झरोखे से देखते हैं उस पहले जश्न की एक झलक जिसने हमारी सालाना परंपराओं की नींव रखी।
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गुलामी से पूरी तरह आजादी
26 जनवरी 1950 का दिन भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इसी दिन डॉ. बी.आर. अंबेडकर के नेतृत्व में बना भारत का संविधान लागू हुआ और देश ने ब्रिटिश साम्राज्य से अपने आखिरी संवैधानिक रिश्ते भी खत्म कर लिए।
इस तारीख को चुनने की एक खास वजह थी- 1930 की \“पूर्ण स्वराज\“ की घोषणा। संविधान लागू होते ही भारत ब्रिटिश ताज के अधीन एक \“डोमिनियन\“ (अधिराज्य) से बदलकर, अपनी खुद की चुनी हुई सरकार वाला एक संप्रभु और लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया।
गवर्नमेंट हाउस में गूंजी तोपों की सलामी
गणतंत्र का औपचारिक ऐलान आज के राष्ट्रपति भवन, जिसे तब \“गवर्नमेंट हाउस\“ कहा जाता था, के भव्य दरबार हॉल में हुआ था। वह ऐतिहासिक घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था:
- सुबह 10:18 बजे: ठीक इसी वक्त भारत को एक \“संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य\“ घोषित किया गया।
- सुबह 10:24 बजे: डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
- सुबह 10:30 बजे: 31 तोपों की सलामी के साथ नए गणतंत्र के जन्म और राष्ट्रपति के पदभार ग्रहण करने की घोषणा की गई।
सेवानिवृत्त हो रहे गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी ने गणतंत्र की उद्घोषणा पढ़ी। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पहले हिंदी और फिर अंग्रेजी में अपना संक्षिप्त भाषण दिया।
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अखंड भारत का सपना हुआ सच
अपने पहले संबोधन में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के एकीकरण को सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा था:
“आज हमारे लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में पहली बार, उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में केप कोमोरिन (कन्याकुमारी) तक, और पश्चिम में काठियावाड़ और कच्छ से लेकर पूर्व में कोकोनाडा और कामरूप तक, यह पूरा विशाल देश एक संविधान और एक संघ के अधिकार क्षेत्र में आ गया है।“
कर्तव्य पथ नहीं, स्टेडियम में हुई थी पहली परेड
समारोह के बाद, राष्ट्रपति का काफिला दिल्ली की सड़कों से गुजरा। उत्साह का आलम यह था कि लोग अपने पहले राष्ट्रपति की एक झलक पाने के लिए छतों और पेड़ों पर चढ़ गए। डॉ. प्रसाद ने हाथ जोड़कर भीड़ का अभिवादन किया।
दिलचस्प बात यह है कि पहली परेड राजपथ पर नहीं हुई थी:
- यह काफिला दोपहर 3:45 बजे इरविन एम्फीथिएटर (जिसे बाद में नेशनल स्टेडियम कहा जाने लगा) पहुंचा।
- वहां लगभग 15,000 लोग इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने।
- सेना और पुलिस के करीब 3,000 अधिकारियों और जवानों ने वहां सेरेमोनियल परेड की।
पुराना किला की पृष्ठभूमि में मार्च करते सैनिक और ग्रेट प्लेस (अब विजय चौक) पर राष्ट्रपति की बिना सुरक्षा तामझाम वाली सवारी उस दिन की यादगार तस्वीरें बन गईं। अगले साल से यह जश्न राजपथ पर शिफ्ट हो गया, जो अब एक सालाना परंपरा बन चुका है।
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