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नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में होंगे शामि‍ल, मायावती से अनबन के बाद सियासी वजूद बनाने में किया लंबा संघर्ष

deltin33 Yesterday 21:26 views 287
  



राज्य ब्यूरो, लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चुनावी लहरें उठने के साथ ही कई दिग्गज चेहरे सुरक्षित राजनीतिक ठिकाना खोजने निकल पड़े हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले नसीमुद्दीन सिद्दकी आठ साल कांग्रेस में रहने के बाद अब 15 फरवरी को साइकिल की सवारी कर लेंगे। उन्होंने कांग्रेस में काम न मिलने का दर्द बयां करते हुए 24 जनवरी को पार्टी को अलविदा कह दिया था। नसीमुद्दीन के साथ मायावती सरकार में मंत्री रहे अनीस अहमद भी सपाई बन जाएंगे।

2012-2017 के बीच मायावती सरकार में नसीमुद्दीन सबसे कद्दावर मंत्री थे। बाद में मायावती से अनबन की वजह से उन्हें बसपा से हटना पड़ा। इसके बाद नसीमुद्दीन ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। करीब आठ साल कांग्रेस में रहे। पार्टी ने उन्हें पश्चिम क्षेत्र का अध्यक्ष भी बनाया, लेकिन न वो कोई करिश्मा कर पाए और न ही पार्टी।

कांग्रेस में रहते हुए पार्टी के कई नेताओं से उनका मनमुटाव बना रहा। नसीमुद्दीन लगातार हाशिए पर जाते गए। उन्होंने 2019 में बिजनौर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, जहां जमानत भी नहीं बचा पाए। पिछले माह नसीमुद्दीन ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्हें पार्टी कोई काम नहीं दे रही है। पार्टी उनकी संगठनात्मक क्षमता का कोई प्रयोग नहीं कर रही है, जिसके पीछे कुछ बड़े नेताओं का हाथ होने का संकेत दिया था।

पार्टी छोड़ने के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे उन्हें मनाने घर भी गए, लेकिन बात नहीं बनी। कांग्रेस से अलग होने के बाद नसीमुद्दीन ने मायावती की तारीफ कर पुरानी पार्टी में वापसी का मन बनाया, लेकिन बसपा ने कोई दिलचस्पी नहीं ली।

इसके साथ ही वह समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के व्यवहार की तारीफ करते हुए दूसरा रास्ता भी खुला रखा। बीच में चर्चा उठी कि वो नगीना सांसद चंद्रशेखर और पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य से मिलकर कोई तीसरा ध्रुव बना सकते हैं। आखिरकार तमाम चर्चाओं के बीच नसीमुद्दीन ने अपना भविष्य सपा में देखा। पार्टी में उनका कद बढ़ाने के लिए ज्वॉइनिंग के समय अखिलेश यादव भी रहेंगे। वहीं, दूसरी ओर राजनीति के जानकारों का कहना है कि आजम खान की राजनीतिक अनुपस्थिति के बीच संगठन का माहिर मुस्लिम चेहरा पार्टी का जनाधार बढ़ाएगा, वहीं पहले से सक्रिय मुस्लिम चेहरों में बेचैनी बढ़ेगी।

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