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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। घरेलू हिंसा से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा वाला अधिनियम किसी भी पीड़ित महिला को यह अधिकार नहीं देता कि एक घर मौजूद होने पर भी वह किसी विशेष संपत्ति में रहने पर जोर दे। न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने कहा कि महिला ससुराल से दूसरी जगह स्थानांतरित हो गई थी और उसने खुद अपनी शिकायत में कहा था कि वह इलाज के मकसद से वहां स्थानांतरित हुई थी।
81 साल की एक महिला की अर्जी को खारिज करते हुए अदालत ने उक्त टिप्पणी की। महिला ने अपने शादीशुदा घर में कब्जा वापस पाने की मांग की थी। महिला ने कहा था कि वह अपनी मर्जी से अपने पति की दूसरी संपत्ति चली गई थी।
महिला ने दावा किया था कि वह लगभग छह दशकों से ससुराल में रह रही थी और अप्रैल 2023 में मेडिकल इलाज के लिए अपनी बेटी के घर में कुछ समय के लिए ही शिफ्ट हुई थी। जुलाई 2023 में लौटने की कोशिश करने पर, उसने आरोप लगाया कि उसे घर में घुसने नहीं दिया गया।
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम पीड़ित महिला के अधिकारों को मालिकों के अधिकारों के साथ संतुलित करता है। इस मामले में महिला को घर वापस लाने के लिए मजबूर करने से घर में रहने वालों का तय कब्जा बिगड़ जाएगा और इस तरह यह कानून से बाहर जाना होगा। अदालत ने कहा कि ऐसे में महिला संबंधित संपत्ति में वापस आने की हकदार नहीं है।
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