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Kanpur GSVSS PGI ने तैयार किया AI साफ्टवेयर, मात्र 20 मिनट में बीमारी, समस्या व गंभीरता बता रहा

deltin33 1 hour(s) ago views 458
  

जांच के लिए एआइ साफ्टवेयर आधारित सीटी स्कैन मशीन। जीएसवीएसएस पीजीआइ



अंकुश शुक्ल, कानपुर। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) आम आदमी का जीवन किस तरह सरल बना रहा है, इसका ठोस उदाहरण कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी सुपर स्पेशियलिटी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट (GSVSS PGI) में सामने आया है। यहां एआइ आधारित साफ्टवेयर सीटी स्कैन और एमआरआइ की रिपोर्ट महज 20 मिनट में तैयार कर रहा है, जिससे मरीजों को समय पर सटीक इलाज मिल पा रहा है और भागदौड़ कम हुई है। दिल्ली में चल रही एआइ समिट के बीच कानपुर का यह माडल बताता है कि एआइ केवल तकनीकी चर्चा का विषय ही नहीं, बल्कि मरीजों के जीवन की सुरक्षा और उपचार की गति बढ़ाने वाला व्यावहारिक समाधान बन चुका है।

कानपुर देहात के गजनेर निवासी 45 वर्षीय विजय सड़क हादसे में सिर पर गंभीर चोट लगने के बाद न्यूरो सर्जरी विभाग में भर्ती हुए। मल्टीपल फ्रैक्चर की आशंका पर एआइ आधारित सीटी स्कैन मशीन से जांच की गई। जांच रिपोर्ट में ब्रेन की नसों को हुए नुकसान और ट्रामा इंजरी की गंभीरता का सटीक अध्ययन 20 मिनट में मिल गया, जिससे तत्काल उपचार शुरू किया जा सका। इसी तरह घाटमपुर के 56 वर्षीय शिवदयाल पेट दर्द की समस्या पर गैस्ट्रो विभाग में भर्ती हुए। एआइ आधारित साफ्टवेयर से तैयार रेडियोलाजी रिपोर्ट में बड़ी आंत में जख्म की पुष्टि हुई। पहले वह शहर के कई अस्पतालों में परामर्श ले चुके थे, लेकिन रोग की गंभीरता स्पष्ट नहीं हो सकी थी। यहां सटीक रिपोर्ट मिलने पर सही उपचार शुरू हुआ।

संस्थान में सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं के लिए प्रतिदिन 600 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। इनमें न्यूरो सर्जरी और न्यूरोलाजी के 25 से 30 मरीजों को प्रतिदिन एमआरआइ और सीटी स्कैन की जरूरत पड़ती है। पहले रिपोर्ट तैयार होने में एक से डेढ़ घंटे का समय लगता था और न्यूरो रेडियो डायग्नोस्टिक विभाग में प्रतीक्षा बढ़ जाती थी। रेडियोलाजिस्ट की कमी के कारण देरी और गंभीर मरीजों के उपचार पर असर पड़ने का खतरा रहता था। एआइ आधारित साफ्टवेयर ने इस समस्या को काफी हद तक कम किया है।

एआइ साफ्टवेयर में पहले से ही देश के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा सत्यापित गंभीर बीमारियों का डाटा संरक्षित है। यह मरीज के इतिहास और जांच परिणामों का विश्लेषण कर जटिलता के आधार पर प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करता है। इसके बाद रेडियोलाजिस्ट उसकी समीक्षा कर अंतिम रूप देते हैं। इस दो स्तरीय जांच प्रणाली से त्रुटि की संभावना कम होती है और सटीकता सुनिश्चित होती है।
इन बीमारियों में कारगर

अक्टूबर 2025 से 90 दिन तक चले ट्रायल में 50 से अधिक मरीजों को समय पर उपचार मिल सका। 70 से 80 प्रतिशत तक रिपोर्ट प्रारंभिक स्तर पर सटीक पाई गईं, शेष मामलों में रेडियोलाजिस्ट ने संशोधन कर डाटा अपडेट कराया। यह साफ्टवेयर ब्रेन और स्पाइन की जटिल बीमारियों, ट्यूमर (कैंसर), संक्रमण (एन्सेफेलाइटिस), सूजन संबंधी रोग (मल्टीपल स्क्लेरोसिस), न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग (पार्किंसन, अल्जाइमर) तथा स्पाइनल स्टेनोसिस या हर्नियेटेड डिस्क की रिपोर्टिंग में विशेष रूप से कारगर है।
खून की जांच के लिए भी हो रहा परीक्षण

जीएसवीएसएस पीजीआइ के नोडल अधिकरी डा. मनीष सिंह के अनुसार बढ़ती मरीज संख्या के बीच एआइ आधारित रिपोर्टिंग से जांच प्रक्रिया तेज हुई है और गंभीर मरीजों का उपचार समय पर संभव हो रहा है। जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य प्रो. संजय काला ने बताया कि साफ्टवेयर का परीक्षण सफल रहा है और रेडियोलाजिस्ट की कमी के बीच यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उपयोगी सहयोगी बन सकती है। भविष्य में अन्य बीमारियों को शामिल करते हुए ब्लड बैंक में खून की जांच के लिए भी इसके परीक्षण की दिशा में कार्य चल रहा है।

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