सात सालों में पहली बार बदली होली की तारीख
जागरण संवाददाता, पटना। रंग और भाईचारे का पर्व होली बीते छह वर्षों के दौरान इस बार चार मार्च को पड़ रहा है, जो समय से पहले है। ज्योतिष आचार्य पीके युग ने बताया कि इस बार अधिकमास होने के कारण कई पर्व-त्योहार पहले होंगे। ज्येष्ठ मास इस बार दो माह होने से पर्व भी बीते वर्ष की तुलना में जल्दी होगा।
बीते वर्ष 15 मार्च शनिवार को होली का पर्व मनाया गया था, जो इस बार चार मार्च को होगा। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की रात में होलिका दहन और इसके अगले दिन होली मनाने की परंपरा रही है, लेकिन इस बार भद्रा और चंद्रग्रहण होने से बदलाव हो रहा है।
इस वर्ष दो मार्च को होलिका दहन और इसके एक दिन बाद चार मार्च को होली मनाई जाएगी। वर्ष पंचांग गणना और शास्त्रीय निर्णय के आधार पर पर्व तिथियों में आंशिक परिवर्तन होगा। पंडित राकेश झा ने पंचांगों के अनुसार बताया कि होलिका दहन को लेकर मिथिला और बनारस दोनों पंचांग में दो मार्च सोमवार को बताया गया है।
फाल्गुन शुक्ल की पूर्णिमा दो दिन होने से होलिका दहन के एक दिन बाद होली का पर्व मनाया जाएगा। फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत दो मार्च सोमवार को तथा स्नान-दान की पूर्णिमा तीन मार्च मंगलवार को होगी। फाल्गुन की पूर्णिमा सोमवार दो मार्च की शाम 5.32 बजे से शुरू हो रही है जो तीन मार्च मंगलवार की शाम 4.46 बजे तक है। दो मार्च को पूर्णिमा लगते ही भद्रा का प्रवेश हो रहा है।
धर्म सिंधु के अनुसार भद्रा के मुख काल को त्याग कर उसे पुच्छ काल में ही होलिका दहना करनी चाहिए। इसी आधार पर दो मार्च की अर्धरात्रि के 12.50 बजे से 2.02 बजे के बीच पूर्णिमा तिथि व मघा नक्षत्र में होलिका दहन करना शास्त्र सम्मत होगा। वहीं तीन मार्च को सूर्योदय कालीन पूर्णिमा, स्नान दान की पूर्णिमा, कुलदेवता को सिंदूर अर्पण किया जाएगा।
दो नक्षत्रों के युग्म में मनेगी होली:
तीन मार्च की शाम 5.50 बजे से 6.47 बजे के बीच चंद्रग्रहण लग रहा है, जो भारत में 20 मिनट तक दिखाई देखा। चंद्रग्रहण पूर्ण रूप से दिखाई देगा। इस दौरान चांद पूरी तरह से लाल रंग का दिखाई देगा। ऐसे में इसे ब्लड मून कहा जा सकता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्र ग्रहण से लगभग नौ घंटे पहले सूतक काल आरंभ हो जाता है। मतलब तीन मार्च की सुबह नौ बजे से सूतक शुरू हो जाएगा।
सूतक को लेकर शास्त्रों में कहा गया है कि सूतक काल में शुभ और मांगलिक कार्य नहीं करनी चाहिए। ऐसे में तीन मार्च को रंगोत्सव मनाना ठीक नहीं है। इस दिन केवल जप, ध्यान और पूजन पाठ करना चाहिए। ऐसे में चार मार्च को होली मनाना शास्त्र सम्मत होगा।
होली पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र एवं उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के युग्म संयोग में मनाई जाएगी। सुबह 7.27 बजे तक पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा फिर पूरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा धृति योग विद्यमान रहेगा। सूर्य देव शतभिषा नक्षत्र एवं कुंभ राशि में रहेंगे।
रोग शोक निवृत्ति के लिए होलिका की होगी पूजा:
होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजन के बाद उसमें आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धुप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डालकर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता का ह्रास, रोग-शोक से मुक्ति व मनोकामना की पूर्ति होती है।
होलिका दहन की पूजा करने से होलिका की अग्नि में सभी दुःख, कष्ट, रोग-दोष जलकर खत्म हो जाते है और ग्रहदोष भी दूर होते हैं। होलिका के जलने के बाद उसमें चना या गेहूं की बाली को सेक या पकाकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से स्वास्थ्य अनुकूल, दीर्घायु, ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।
छह वर्षों में होली की तिथि:
- 2025: 15 मार्च (शनिवार)
- 2024: 26 मार्च (मंगलवार)
- 2023: 8 मार्च (बुधवार)
- 2022: 19 मार्च (शनिवार)
- 2021: 29 मार्च (सोमवार)
- 2020: 10 मार्च (मंगलवार)
राशि के अनुसार खेलें होली:
- मेष: लाल,पीला व सफेद
- वृष: सफेद, हरा व नीला
- मिथुन: हरा, नीला व सफेद
- कर्क: सफेद, पीला व लाल
- सिंह: लाल, गुलाबी, पीला व सफेद
- कन्या: हरा, नीला व चमकीला सफेद
- तुला: सफेद, हरा व नीला
- वृश्चिक: गुलाबी, नारंगी, पीला
- धनु: पीला, गुलाबी व नारंगी
- मकर: नीला, हरा व बैंगनी
- कुंभ: नीला, हरा व सफेद
- मीन: पीला, गुलाबी, लाल व सफेद
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