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जागरण संवाददाता, भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में बुधवार को तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इसका आयोजन विश्वविद्यालय और एकेडमी आफ नेचुरल रिसोर्स कंजरवेशन एंड मैनेजमेंट लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।
सम्मेलन का मुख्य व्याख्यान आनलाइन माध्यम से इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एरिड टापिक्स के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक ने दिया। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य को जलवायु-स्मार्ट कृषि, कार्बन अवशोषण और टिकाऊ कृषि सघनीकरण से जोड़ते हुए कहा कि भविष्य की कृषि नीतियों में मृदा को केंद्र में रखना होगा। उन्होंने इस संयुक्त पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे मंच नीति, अनुसंधान और व्यवहारिक क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
कुलपति डा. डीआर. सिंह ने कहा कि मृदा विज्ञान अनुसंधान को और अधिक सशक्त बनाते हुए संसाधन संरक्षण आधारित नवाचारों को सीधे किसानों तक पहुंचाना विश्वविद्यालय की प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक शोध, नीति निर्माण और किसान हितैषी तकनीकों के समन्वय से ही कृषि एवं पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बिधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति-कुलपति डा. बिस्वपति मंडल ने कृषि तंत्र में लचीलापन (रेज़िलिएंस) की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में मृदा की उत्पादकता और गुणवत्ता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने वैज्ञानिक हस्तक्षेपों के साथ स्थानीय ज्ञान और किसानों की सहभागिता को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया।
विशिष्ट अतिथि आईसीएआर-सेंट्रल साइल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डा. डीके. शर्मा ने मृदा लवणता प्रबंधन, क्षारीय भूमि सुधार और पुनर्वास तकनीकों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वैज्ञानिक पद्धतियों के समुचित उपयोग से बंजर और अनुपजाऊ भूमि को भी उत्पादक बनाया जा सकता है।
इससे पहले, उद्घाटन सत्र की शुरुआत आयोजन सचिव डा. अंशुमान कोहली के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण, पोषक तत्वों की कमी और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने मृदा स्वास्थ्य को गंभीर चुनौती के रूप में खड़ा किया है।
ऐसे समय में सुदृढ़ मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन ही कृषि उत्पादकता, पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला बन सकता है। उन्होंने संसाधन संरक्षण आधारित तकनीकों-जैसे संरक्षण कृषि, फसल चक्र विविधीकरण, जैविक कार्बन संवर्धन और सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन को व्यापक स्तर पर अपनाने पर बल दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में अकादमी के अध्यक्ष डा. एके. सिंह ने दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए सहयोगात्मक अनुसंधान और संस्थागत साझेदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि मृदा, जल और जैव विविधता संरक्षण को एकीकृत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है, तभी कृषि प्रणाली जलवायु झटकों के प्रति लचीली बन सकेगी।
उद्घाटन सत्र के दौरान विश्वविद्यालय के मीडिया केंद्र द्वारा सफरनामा प्रस्तुति दी गई, जिसमें विश्वविद्यालय की अनुसंधान उपलब्धियों, प्रसार कार्यक्रमों और किसानों तक पहुंच रही नवाचार पहलों को दर्शाया गया। मंचासीन अतिथियों ने सम्मेलन की सार-संग्रह पुस्तक, स्मारिका और अन्य प्रकाशनों का विमोचन किया, जो इस राष्ट्रीय विमर्श के दस्तावेजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
उद्घाटन सत्र का समापन मृदा वैज्ञानिक डा. सागर के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। अगले दो दिनों तक आयोजित तकनीकी सत्रों, शोध पत्र प्रस्तुतियों और विशेषज्ञ संवादों के माध्यम से सुदृढ़ मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की ठोस रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा होगी। सम्मेलन से उम्मीद है कि यह राष्ट्रीय मंथन कृषि और पर्यावरणीय सतत विकास के लिए व्यावहारिक समाधान एवं नीतिगत दिशा प्रदान करेगा, जिसका लाभ अंततः किसानों और समाज को मिलेगा।
खेती से फायदे के लिए मिट्टी के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी : डा. राजाराम त्रिपाठी
देश के सबसे समृद्ध किसान डा. राजाराम त्रिपाठी सम्मलेन में अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने खेती से फायदे के लिए मिट्टी के स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया। डा. राजाराम मूल रूप से औषधीय पौधों की खेती करते हैं और खेती में हाईटेक तकनीक से जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य पर विशेष कार्य करते हैं। इनके मसाले और औषधीय उत्पाद की मांग विदेशों में भी है।
इन्होंने बैंक आफिसर की नौकरी छोड़कर नक्सल प्रभावित बस्तर के जंगल में अपनी खेती-किसानी को अंकुरित किया। कुलपति डा. डीआर.सिंह ने कहा कि ऐसे नवाचारी किसान देश के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। |
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