झारखंड राय यूनिवर्सिटी के छात्रों ने मंदिर के फूलों से बनाया हर्बल गुलाल।
कुमार गौरव, जागरण। झारखंड राय यूनिवर्सिटी रांची के बीएससी एग्रीकल्चर के विद्यार्थियों ने पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश देते हुए हर्बल गुलाल तैयार किया है। कैंपस में विद्यार्थियों का यह प्रयास होली जैसे त्योहार को इको फ्रेंडली बनाने और त्योहारों को मनाने की भारतीय ज्ञान परंपरा का भी प्रतीक है।
बीएससी एग्रीकल्चर अंतिम वर्ष की छात्रा दीपिका इस बारे में बताती हैं कि हर्बल गुलाल बनाना और इसकी तकनीक से अवगत होना ही हमारे एक्सपेरिमेंटल लर्निंग प्रोग्राम का उद्देश्य नहीं है बल्कि यह प्रयास आत्मनिर्भर भारत के सपने की ओर भी एक कदम है।
विशेष बात यह कि छात्रों ने स्वयं से लागत लगाकर इको फ्रेंडली हर्बल गुलाल को तैयार किया है। साथ ही इसकी बिक्री से होने वाली आमदनी भी वह स्वयं को और बेहतर करने पर खर्च करने में लगे हैं।
बीएससी एग्रीकल्चर अंतिम वर्ष के विद्यार्थी शुभम और स्नेहा कोनार ने हर्बल गुलाल बनाने और बिक्री से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए बताया इस प्रयास में 14 विद्यार्थी शामिल हैं। हमने अभी तक 200 पैकेट हर्बल गुलाल की बिक्री की है।
इसमें सबसे पहले यूनिवर्सिटी के शिक्षकों एवं कर्मियों को इको फ्रेंडली होली मनाने और हर्बल गुलाल के प्रयोग के प्रति जागरूक करते हुए बेचा गया है। इको-फ्रेंडली गुलाल एकदम चिकना और मुलायम होता है, जिसे रंग के हिसाब से अलग-अलग पैकेट्स में पैक किया गया है।
प्रति 100 ग्राम पैकेट की कीमत सिर्फ 80 रुपये है। यूनिवर्सिटी के कृषि विभाग की प्रोफेसर डाॅ. नेहा ग्रेस एंजेल किस्कू ने इस बारे में जानकारी देते कहा कृषि स्नातक की पढाई कर रहे विद्यार्थियों को अंतिम वर्ष में एक प्रायोगिक प्रशिक्षण जिसे एक्सपेरिमेंटल लर्निंग प्रोग्राम (ईएलपी) कहा जाता है करना होता है।
हर्बल गुलाल बनाना और इसकी बिक्री पूरी तरह एग्री वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने का ही एक प्रयास है।
इस तरह बनाया हर्बल गुलाल
हर्बल गुलाल बनाने में जो फूल इस्तेमाल किए गए हैं वे सभी मंदिरों में पूजा के दौरान इस्तेमाल किए गए हैं जिन्हें बाद में फेंक दिया जाता है। विद्यार्थियों ने पहले चरण में इस प्रकार के फूलों को नामकुम और आसपास के क्षेत्रों के मंदिरों से इकट्ठा किया और इसकी अच्छी तरह से सफाई कर इनमें लगी पत्तियों को हटाया।
फिर इन्हें गर्म पानी में उबाल कर इनसे प्राकृतिक रंग प्राप्त किया गया। फिर इसमें अरारोट और फिटकरी उचित मात्र में मिलाई गई ताकि गुलाल के रंग फटे नहीं। तैयार होने से पहले इसमें बेहद सीमित मात्रा में सुगंध डाला जाता है। तीन से चार दिनों की मेहनत के बाद हर्बल गुलाल इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है।
कुलपति ने की सराहना, कहा- अब और नया करेंगे
विद्यार्थियों का यह प्रयास सराहनीय है। गुलाल बनाने में यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रमों के बाद जमा किए गए फूलों का भी उपयोग किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य विद्यार्थियों को एग्री वेस्ट मैनेजमेंट के बारे में जानकारी देने के साथ उन्हें स्किल्ड बनाकर बिजनेस और स्टार्टअप के क्षेत्र में मेंटरिंग प्रदान करना है।
-प्रोफेसर डाॅ. पीयूष रंजन, कुलपति, झारखंड राय यूनिवर्सिटी रांची।  |
|