ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर तबाही मचाने लाली ब्रह्मोस मिसाइल ग्लोबल सेंसेशन बन गई है। दुनिया के कई देश भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वहीं इंडोनेशिया ने भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए समझौता किया है। यह जानकारी इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता रिको रिकार्डो सिरैत ने दी।
बता दें कि, इससे पहले 2023 में भारत और रूस की साझेदारी वाली कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने बताया था कि वह जकार्ता के साथ लगभग 200 से 350 मिलियन डॉलर की डील को लेकर आगे की बातचीत कर रही है। रिको सिरैत ने कहा कि यह समझौता इंडोनेशिया की सेना को आधुनिक बनाने की योजना का हिस्सा है। खास तौर पर इसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा (मैरीटाइम सेक्टर) में देश की रक्षा क्षमता को मजबूत करना है। हालांकि उन्होंने इस समझौते की कुल कीमत के बारे में कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया।
दुश्मनों का काल है ब्रह्मोस
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ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे दुनिया की सबसे तेज और एडवांस मिसाइलों में गिना जाता है। इसे भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन (DRDO) और रूस की कंपनी NPO मशीनोस्ट्रोयेनिया ने मिलकर बनाया है। दोनों की साझेदारी से बनी कंपनी का नाम ब्रह्मोस एयरोस्पेस है। “ब्रह्मोस” नाम भी दो नदियों से मिलकर बना है—भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा नदी।
यह मिसाइल लगभग Mach 2.8 से Mach 3.0 की गति से उड़ती है, यानी आवाज़ की गति से करीब तीन गुना तेज़। इतनी तेज रफ्तार के कारण मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।
ब्रह्मोस को कई तरीकों से लॉन्च किया जा सकता है। इसे जमीन से (मोबाइल लॉन्चर), समुद्र से (युद्धपोत), पनडुब्बी से और हवा से (Su-30MKI फाइटर जेट) भी दागा जा सकता है। यह “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर काम करती है, यानी लक्ष्य तय करने के बाद इसे अलग से नियंत्रित करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसकी सटीकता भी बहुत ज्यादा है और इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) लगभग 1 मीटर माना जाता है।
इस मिसाइल की मूल रेंज लगभग 290 किलोमीटर है, जबकि इसके नए और उन्नत संस्करण की रेंज 450 से 800 किलोमीटर तक बताई जाती है। ब्रह्मोस दुश्मन के रडार से बचने के लिए 3 से 10 मीटर की बहुत कम ऊंचाई पर उड़ सकती है, जबकि जरूरत पड़ने पर यह लगभग 15 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर भी जा सकती है।
भविष्य के वेरिएंट
ब्रह्मोस-NG (नेक्स्ट जेनरेशन): यह ब्रह्मोस का नया और छोटा वर्ज़न होगा। इसे पहले से हल्का और ज्यादा स्टेल्थ तकनीक वाला बनाया जा रहा है, ताकि LCA तेजस जैसे फाइटर एयरक्राफ्ट से भी आसानी से लॉन्च किया जा सके।
ब्रह्मोस-II: यह एक प्रस्तावित हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है। इसकी रफ्तार Mach 7 से 8 तक होने की उम्मीद है, यानी यह आवाज की गति से कई गुना तेज होगी।
इसका इस्तेमाल कब हुआ?
साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान के अंदर मौजूद रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया था।
इंपोर्टर से एक्सपोर्टर बना भारत
अब भारत केवल रक्षा तकनीक खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह हाई-टेक डिफेंस सिस्टम का निर्यात भी करने लगा है। भारत ने 2022 में फिलीपींस के साथ लगभग 375 मिलियन डॉलर की ऐतिहासिक ब्रह्मोस डील की थी। इसके बाद 9 मार्च 2026 तक इंडोनेशिया ने भी ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदने के समझौते की पुष्टि कर दी है। |