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छन्नुलाल मिश्र ने ठुमरी से रामायण तक को दी आवाज, दिल्ली के श्रोताओं के दिल में बसे हैं सुर सम्राट

cy520520 2025-10-3 04:36:21 views 1291
  पंडित छन्नूलाल मिश्र के बिना अधूरे थे दिल्ली के प्रतिष्ठित संगीत समारोह





जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। बनारस घराने के प्रमुख स्तंभ और पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्र का संगीत की आत्मा भले ही काशी (वाराणसी) था, लेकिन दिल्ली के सांस्कृतिक पटल पर उनके अमूल्य योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। पं. छन्नूलाल मिश्र एक ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत और लोकगीत को एक साथ पिरोकर नई पहचान दी। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
पुरब अंग शैली को दी नई ऊंचाई

पंडित छन्नूलाल मिश्र के बिना दिल्ली के प्रतिष्ठित संगीत समारोह अधूरे माने जाते थे। उनके श्रोता उपशास्त्रीय गायन के रस में सराबोर होने के लिए दूर-दूर से दिल्ली आते थे। उन्होंने अपनी गायकी से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत विशेषकर ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती की पुरब अंग शैली को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाया। दिल्ली के राष्ट्रीय समारोहों, प्रतिष्ठित संगीत अकादमियों और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति ने इस परंपरा को जीवंत बनाए रखा। उन्होंने दिल्ली के संगीत प्रेमियों की कई पीढ़ियों को इस कला से जोड़े रखा।


कला की अमिट धाक जमाई

वहीं, पद्मश्री लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने बताया कि गायन में प्रसिद्धि हासिल करने के बावजूद पं. छन्नूलाल मिश्र चौकाचौंध से दूर रहकर सादगी भरा जीवन जीना पसंद करते थे। उनकी प्रस्तुति का आकर्षण केवल रागों तक सीमित नहीं थी। उनके मुख से निकली रामायण की चौपाइयां श्रोताओं को आध्यात्मिक शांति से भर देती थीं। दिल्ली के सरकारी गलियारों से लेकर संजीदा संगीत समारोहों तक पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने हर जगह अपनी कला की अमिट धाक जमाई। सही मायनों में उन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से दिल्ली के मंच को एक नया गौरव प्रदान किया। जिससे उनकी विरासत और अधिक अमर हो गई।


लंबे समय तक शीर्ष ग्रेड के कलाकार रहे

पं. छन्नूलाल मिश्रा भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण (2010) और पद्म विभूषण (2020) जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा गया, जो उन्हें दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोहों में प्रदान किए गए थे। इसके अलावा आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन में लंबे समय तक शीर्ष ग्रेड के कलाकार रहे। इन राष्ट्रीय प्रसारण मंचों के माध्यम से उनका संगीत दिल्ली सहित पूरे देश के घरों तक पहुंचा, जिससे शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत को बड़े पैमाने पर पहचान मिली।



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