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हिमालय में जलवायु परिवर्तन का असर, हर साल 6 मीटर सिकुंड रहा चोराबाड़ी ग्लेशियर, वाडिया और GBPNIHE के वैज्ञानिकों ने 20 साल तक की रिसर्च

Chikheang Half hour(s) ago views 919
  



विनय बहुगुणा, श्रीनगर गढ़वाल। हिमालय से लगे ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ने लगा है, लेकिन सभी ग्लेशियरों की सिकुड़ने की गति एक समान नहीं है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण केदारनाथ क्षेत्र में स्थित चोराबाड़ी और कंपेनियन ग्लेशियर के अध्ययन से सामने आया है। यह दोनों ग्लेशियर एक-दूसरे के सामने हैं, लेकिन दोनों के पिघलने की गति में लगभग दोगुना अंतर है। एक तरफ जहां कंपेनियन ग्लेशियर प्रतिवर्ष 2 से 3 मीटर पीछे खिसक रहा है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

वहीं, चोराबाड़ी ग्लेशियर के सिकुड़ने की गति प्रतिवर्ष 6 मीटर से अधिक है। बीते दो दशक में कंपेनियन ग्लेशियर जहां 70 मीटर पीछे खिसक चुका है। वहीं, चोराबाड़ी ग्लेशियर की लंबाई में 120 मीटर की कमी दर्ज हुई है। वैज्ञानिकों ने उप ग्रह आंकड़ों और स्तरीय निरीक्षणों से दोनों ग्लेशियर का अध्ययन किया है, जिसमें इनके मुख के पीछे हटने की गति का पता चला।

आमने-सामने हैं दोनों ग्लेशियर

केदारनाथ से लगभग 6 किमी दूर हिमालय की तलहटी से लगा चोराबाड़ी ग्लेशियर की लंबाई करीब 7.5 किमी है। वहीं, कंपेनियन ग्लेशियर की लंबाई 4.6 किमी है। यह दोनों ग्लेशियर आमने-सामने हैं, लेकिन दोनों के पिघलने की गति अलग-अलग है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान के संयुक्त शोध में यह बात सामने आई है। इस संबंध में शोधपत्र एक शोधपत्र भी बीते वर्ष प्रकाशित हो चुका है। वाडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक व ग्लेशियर विशेषज्ञ डा. मनीष मेहता ने बताया कि वर्ष 2000 से 2020 के बीच दोनों ग्लेशियर का गहन अध्ययन किया गया।

इस दौरान दोनों ग्लेशियर की प्रतिवर्ष सिकुड़ने की गति को देखा गया। पाया गया कि कंपेनियन ग्लेशियर का मुख केवल 70 मीटर पीछे खिसका है। इस ग्लेशियर की पीछे खिसकने की औसत वार्षिक दर 2 से 3 मीटर रही, जो उत्तराखंड हिमालय के अधिकांश ग्लेशियरों की तुलना में काफी कम है। जबकि इसके विपरीत मंदाकिनी नदी के प्रमुख उदगम चोराबाड़ी ग्लेशियर का टर्मिनस औसतन 6 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहा है।

डा. मेहता ने बताया कि इतने नजदीक स्थित दो ग्लेशियरों के व्यवहार में यह अंतर मुख्य रूप से पर्यावरणीय परिस्थितियों और मौसम चक्र में हो रहे बदलाव के कारण हुआ है। बीते वर्षों में घाटी क्षेत् के जंगलों में हुई वनाग्नि की अत्यधिक घटनाओं का भी हिमालय के ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। डा. मेहता ने बताया कि एक ग्लेशियर का धीमी गति से पीछे हटना यह संकेत नहीं है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। साथ ही तेज़ी से सिमट रहे ग्लेशियर से भविष्य में केदारघाटी, मंदाकिनी घाटी सहित बड़े क्षेत्र में जल संसाधनों की कमी हो सकती है। इसलिए यहां दीर्घकालीन निगरानी जरूरी है। उन्होंने बताया कि चोराबाड़ी ग्लेशियर का वर्ष 1962 से वैज्ञानिक अध्ययन करते आ रहे हैं।

इसलिए कम रफ्तार से पिघल रहा कंपेनियन ग्लेशियर

कंपेनियन ग्लेशियर के निचले हिस्से पर एक से तीन मीटर मोटी चट्टानी परत जमी हुई है, जो इंसुलेटर की तरह काम करती है, और बढ़ते तापमान के बावजूद बर्फ को सीधी धूप से बचाती है। इस वजह से इस ग्लेशियर की पिघलन की गति धीमी बनी हुई है।
सूरज की गर्मी को अधिक अवशोषित कर रहा चोराबाड़ी ग्लेशियर

चोराबाड़ी ग्लेशियर पर मौजूद मलबा पतला और असमान है, जो सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित कर रहा है। साथ ही ग्लेशियर की अधिक ढलान वाली सतह पिघलन की गति और पीछे हटने की प्रक्रिया को तेज कर रही है। यही वजह है कि पर्यावरण और मौसम में हो रहे बदलाव का असर चोराबाड़ी ग्लेशियर पर कहीं अधिक पड़ रहा है।

पांच सदस्यीय टीम ने किया अध्ययन

2000 से 2020 तक डा. मनीष मेहता के मार्गदर्शन में पुरूषोत्तम कुमार गर्ग, अर्पणा शुक्ला, पंकज चौहान, पंकज केशवानी और संदीपन मुखर्जी ने दोनों ग्लेशियर के उपग्रह आंकड़ों और स्थलीय निरीक्षण कर अध्ययन किया है। इस शोध के आधार पर फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस शोधपत्र भी प्रकाशित किया गया है।1


अन्य 14 ग्लेशियर भी पीछे खिसक रहे

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विवि के भूगर्भ विज्ञान विषय के प्ररो. डा. एमपीएस बिष्ट के अनुसार 2002 से अब तक उन्होंने 14 ग्लेशियरों का अध्ययन किया है। इस दौरान पाया गया कि सभी ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव ग्लेशियर और वनस्पतियों पर पड़ता है। बताया कि फूलों की घाटी, नंदादेवी, ऋषि गंगा साउथ, नार्थ सहित अन्य ग्लेशियरों की स्थिति भी अच्छी नहीं है।

इसलिए जरूरी है कि हिमालय जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में ग्लेशियर-विशेष अध्ययन, दीर्घकालिक निगरानी और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के लिए ठोस कार्य किया जाए। चोराबाड़ी और कंपेनियन ग्लेशियर केदारनाथ क्षेत्र और मंदाकिनी घाटी के जीवन का मूल आधार हैं, इसलिए यहां चौकस निगरानी और हर गतिविधि पर नजर रखने की जरूरत है। जून 2013 की आपदा का प्रमुख कारण चोराबाड़ी ताल ही रहा है, ऐसे में इस संवेदनशील क्षेत्र में पर्यावरण प्रभाव का नियमित अध्ययन होना चाहिए।
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