अस्पताल में बेटे की मौत के बाद शव लेकर भटकती मां को नहीं मिला वाहन।
जागरण संवाददाता, हरदोई। जिस मां ने नौ महीने कोख में पालकर बेटे को जन्म दिया, उसी मां की गोद में उसकी सांसें थम जाएं और फिर वही मां अस्पताल के दरवाजे पर शव वाहन के लिए भटकती रहे, यह किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे दर्दनाक तस्वीर है। मेडिकल कॉलेज अस्पताल की इमरजेंसी में एक मासूम की मौत के बाद जो हुआ, उसने इंसानियत और सिस्टम दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया।
मेडिकल कॉलेज अस्पताल की इमरजेंसी कक्ष की व्यवस्था सोमवार को उस वक्त सवालों के घेरे में आ गई, जब इलाज के दौरान एक मासूम बच्चे की मौत के बाद जिम्मेदारों ने शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया।
मजबूर होकर मां को अपने बेटे का शव गोद में थमाकर अस्पताल से बाहर भेज दिया गया। वाहन के इंतजार में भटकती मां आखिरकार एक ई-रिक्शा से बेटे का शव घर ले जाने को विवश हुई।
ग्राम मन्नापुरवा निवासी सुमन ने बताया कि हर्षित उसका इकलौता बेटा था। रविवार रात अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। सोमवार सुबह हालत और गंभीर हो गई, सांस लेने में दिक्कत होने लगी। घबराई मां बेटे को लेकर आनन-फानन में मेडिकल कॉलेज अस्पताल की इमरजेंसी पहुंची।
चिकित्सकों ने इलाज शुरू किया और करीब डेढ़ घंटे तक प्रयास किए, लेकिन मासूम की सांसें थम गईं। अस्पताल में शव वाहन की सुविधा होने के बावजूद किसी भी कर्मचारी ने इसे उपलब्ध कराना जरूरी नहीं समझा।
इमरजेंसी कक्ष से बेटे का शव गोद में उठाए सुमन अस्पताल के मुख्य गेट तक पहुंची। वहां कई ई-रिक्शा चालकों से घर तक शव ले जाने की गुहार लगाई, लेकिन गोद में शव देखकर अधिकतर ने इंकार कर दिया। करीब 20 मिनट तक बदहवास मां अस्पताल परिसर में भटकती रही।
आखिरकार एक ई-रिक्शा चालक 100 रुपये किराया लेकर शव ले जाने को तैयार हुआ। बेबस मां अस्पताल की व्यवस्था को कोसते हुए 200 रुपये खर्च कर बेटे का शव घर ले जा सकी।
मेडिकल कॉलेज के मीडिया प्रभारी डॉ. शिवम यादव का कहना है कि अस्पताल में 24 घंटे शव वाहन की सुविधा उपलब्ध है। बच्चे को शव वाहन क्यों नहीं मिला, इसकी जानकारी कराई जाएगी। |
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