जागरण संवाददाता, फर्रुखाबाद। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले भारतीय उत्पादों पर लगे 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाने को तैयार न हों लेकिन बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए भारतीय निर्यातक व अमेरिकी कारोबारियों ने बीच का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया है।
वे आपस में समझौता कर रहे हैं जिसमें अमेरिकी कारोबारी जहां बढ़े हुए टैरिफ का बोझ उठाने को तैयार हो रहे हैं, वहीं भारतीय निर्यातक उन्हें अपनी तरफ से कीमत में 10 से 15 प्रतिशत तक छूट देने को तैयार हो गए हैं। इससे यहां के कुशन, कवर निर्यात करने वाली फैक्ट्रियों में पसरा सन्नाटा फिर दूर हो गया है।
उन्होंने बीते पखवाड़े टैरिफ में 10 से 15 प्रतिशत छूट देकर 10 करोड़ से अधिक के आर्डर दिए हैं। ट्रंप के टैरिफ लगाए जाने से पहले फर्रुखाबाद से अमेरिका को हर साल 100 करोड़ से अधिक का सामान निर्यात किया जाता था।
जिले से कुशन व टेबल कवर, वाल पेपर, क्विल्टेड रजाई (हाथ से तगी रजाई), काटन के बैग, तौलिया, बेडशीट, चमड़े की कारपेट (दरी) का निर्यात अमेरिका में किया जाता है। बीते साल 50 प्रतिशत टैरिफ लगने से लगभग 60 लाख रुपये का माल मुंबई पोर्ट से वापस आ गया था।
इसके बाद से कुछ फैक्ट्रियों में उत्पादन लगभग ठप सा हो गया था। यहां के कुछ निर्यातक अमेरिका से ही कारोबार करते हैं, जबकि कई निर्यातक यूरोपीय देशों फ्रांस, जर्मनी, इटली व स्पेन में उत्पादों का निर्यात करते हैं। अमेरिका के कारोबारी टैरिफ लगने के बाद से ही स्थानीय कारोबारियों से छूट की मांग कर रहे थे।
10 से 15 प्रतिशत छूट मिलने से नुकसान कम होने की बात अमेरिका के कारोबारियों ने बताई थी। आपसी बातचीत से छूट पर समझौता होने के बाद आर्डर मिले हैं। चमड़े की कारपेट के निर्यातक विकास गुप्ता के अनुसार अमेरिका से आर्डर मिलते ही फैक्ट्री में उत्पादन बढ़ गया है।
गुणवत्ता में कोई बदलाव नहीं किया है। हालांकि, अमेरिकी व्यवसायी इस बात से सहमत हैं कि डिजाइन व गुणवत्ता में बदलाव हो, तब भी बाजार में माल बिकेगा।
कुशन व टेबल कवर निर्यातक गौरव अग्रवाल ने बताया कि आर्डर मिलने से व्यापारी माल तैयार करा रहे हैं। अमेरिकी टैरिफ के संकट से निपटने के लिए फ्रांस, जर्मनी में भी निर्यात करने लगे हैं।
खरीदार को ही देना होता है टैक्स
टैक्स बार एसोसिएशन फर्रुखाबाद के महासचिव रामजी बाजपेई का बताते हैं कि किसी भी देश में निर्यात होने वाले भारतीय उत्पाद पर देय टैक्स वहां के खरीदार को देना होता है।
माल का निर्यात होने के साथ ही टैक्स जमा करना होता है। स्थानीय उत्पादक व निर्यातक अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारित करते हैं।
अमेरिका निर्यात होने वाले उत्पाद पर स्थानीय कारोबारियों ने 10 से 15 प्रतिशत दर कम की है, जबकि अमेरिका में कारोबारी उत्पाद का मूल्य बढ़ाकर बेचेंगे।
यह इस बात पर निर्भर है कि वही उत्पाद अमेरिका में किसी अन्य देश से कम रेट पर उपलब्ध न हो। उदाहरण स्वरूप भारत में चीनी उत्पाद सस्ते होने से बिक रहे हैं और अपने देश के उत्पाद बाजार में पिछड़ जाते हैं। |
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