कोसी की बालू पर समृद्धि की खेती, यूपी के किसानों से मिल रहा नया मॉडल
विमल भारती, सरायगढ़ (सुपौल)। कोसी नदी के किनारे बालू वाली जमीन अब समृद्धि की नई मिसाल बन रही है। उत्तर प्रदेश के बागपत से आए करीब 100 किसान परिवार यहां खरबूजा, तरबूज, खीरा, ककड़ी, बतिया, कदीमा, भिंडी और करेला की खेती कर बेहतर आमदनी अर्जित कर रहे हैं। प्रत्येक परिवार लगभग एक लाख रुपये निवेश कर मौसमी खेती करता है, जिससे कुल कारोबार डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंच रहा है।
पानी घटते ही नर्सरी तैयार होती है, फरवरी में रोपाई बाद मार्च-अप्रैल से फसलें बाजार में आने लगेगी। कोसी की स्वच्छ और सूखी बालू तरबूज जैसी फसलों के लिए बेहद उपयुक्त साबित हो रही है।
बाढ़ से पहले किसान सुरक्षित लौट जाते हैं। अब स्थानीय किसानों में भी इस तकनीक को लेकर रुचि बढ़ रही है। यदि अनुभव और स्थानीय संसाधन साथ आएं तो कोसी का यह इलाका सब्जी उत्पादन का बड़ा केंद्र बन सकता है।
किसानों ने बताया कि कोसी नदी का पानी जैसे ही घटता है, वैसे ही बालू में नर्सरी तैयार करने का काम शुरू हो जाता है। 15 दिनों के भीतर खीरा बाजार में आ जाएगा, जबकि अप्रैल के अंत तक तरबूज, ककड़ी और बतिया की आवक शुरू हो जाएगी। बालू में उगी फसलों में रोग कम लगते हैं और फल की गुणवत्ता बेहतर होती है।
किसान मो. गुलफान, मो. यासीन अंसारी, मो. मुस्तकीम सहित अन्य किसानों का कहना है कि कोसी के कछार में उगाए गए तरबूज में चमक अधिक होती है और मिठास भी बेहतर रहती है, इसलिए इसकी मांग देश के कई हिस्सों में काफी बढ़ जाती है। जब भीषण गर्मी पड़ती है, उस समय जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, पंजाब, सिलीगुड़ी, नेपाल और नई दिल्ली जैसे स्थानों से बड़े व्यापारी किसानों से संपर्क करते हैं। ट्रकों के जरिए तरबूज और अन्य फसलें देश के विभिन्न बाजारों तक भेजी जाती हैं।
किसानों का यह भी कहना है कि कोसी क्षेत्र में प्राकृतिक परिस्थितियां भी अनुकूल हैं। यदि स्थानीय स्तर पर कृषि विभाग का तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग मिले, तो इस खेती को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सकता है। यह खेती मुख्य रूप से सुपौल जिले के बलुआ घाट से लेकर कोसी बराज के उस पार नेपाल सीमा तक, नदी के दोनों तटों पर बड़े पैमाने पर की जाती है।
बलुआ घाट से लेकर कोसी बाराज तक का इलाका हर साल अप्रैल, मई और जून में एक बड़े अस्थायी कृषि बाजार में तब्दील हो जाता है। इन महीनों में कोसी नदी का तट व्यापारियों का अड्डा बन जाता है। बड़े-बड़े ट्रक दिन-रात फसलों की ढुलाई में लगे रहते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में चहल-पहल बनी रहती है। जैसे ही मानसून की आहट के साथ कोसी नदी में पानी बढ़ने लगता है, बाहर से आए किसान अपना सारा सामान समेटकर वापस लौट जाते हैं।
अब कोसी क्षेत्र के स्थानीय किसानों में भी इस तकनीक को लेकर रुचि बढ़ने लगी है। वे यूपी के किसानों से खेती के तरीके, बीज चयन, नर्सरी प्रबंधन और बाजार से जुड़ने की जानकारी ले रहे हैं।
यदि स्थानीय अनुभव, संसाधन और बाहरी किसानों की तकनीक एक साथ आ जाए, तो आने वाले समय में कोसी का यह इलाका सब्जी और फल उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बन सकता है। यह माडल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगा, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगा। |